नलकूप
खण्ड, मुजफरनगर
(सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश)
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राजकीय नलकूपों का संक्षिप्त परिचय
विवरण
राजकीय नलकूपों का निर्माण– वर्श 1957 में प्रारम्भ किया गया ।
नलकूप खण्ड, मुजफ्फरनगर वर्श 1957 में अस्तित्व में आया ।
वर्श 2009 में नलकूपों का निर्माण कार्य प्रगति में है।
संक्षिप्त टिप्पणी
नलकूप खण्ड, मुजफरनगर के अन्तर्गत राजकीय नलकूपों द्वारा कृषकों को सिंचाई सुविधा
उपलब्ध करायी जाती है। इस खंड का कार्यक्षेत्र जनपद मुजफरनगर में पडता है। इस खंड
की परिसीमा में पडने वाले राजकीय नलकूपों का विकास खण्डवार विवरण निम्नप्रकार है :–
जनपद
मुजफ्फरनगर में राजकीय नलकूपों का विकास खण्ड वार विवरण – क्लिक करें
कृषकों व अन्य समाज की सामान्य जानकारी हेतु विभागीय प्रक्रिया का विवरण
नलकूप खण्ड, मुजफरनगर द्वारा प्रदान की जाने वाली मुख्य सेवा राजकीय नलकूपों के
कमांड क्षेत्र में कृषकों को विभिन्न फसलों के मानक के अनुसार सिंचाई हेतु सस्ती दरों
पर जल उपलब्ध कराना है। जिससे कृषक अपनी उपज बढाकर स्वयं खुशहाल हो सके तथा प्रदेश
एवं देश को स्वावलम्बी बनाने में समुचित योगदान कर सकें।
(1) सेवा का मानक एवं समय सीमा:
कृषकों को आसानी एवं समयबद्व तरीके से प्रर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराने के
उद्देश्य से तदानुसार एक समयबद्ध सिंचाई सेवा का अनुमानित कार्यक्रम (रोस्टर)
निर्धारित प्रारूप पर वर्ष में दो बार फसलवार (रबी एवं खरीफ) हेतु निर्धारित किया
जाता है। इसका अनुमोदन जिलाधिकारी/मुख्य विकास अधिकारी, कृषि विभाग एवं समादेश
क्षेत्र के अधिकारी, अधीक्षण अभियन्ता के साथ–साथ सिंचाई एवं ऊर्जा सलाहकार समिति
तथा जनपद सिंचाई बन्धु से कराया जाता है। रोस्टर का अनुमोदन होने के पश्चात इसे
क्रियान्वयन हेतु छपवाया जाता है। रोस्टर छपवाने के पश्चात् फसल के प्रारम्भ में ही
इसको सभी सम्बंधित सांसदों, विधायकों, ब्लाक प्रमुखों को एवं खण्ड विकास अधिकारी के
माध्यम से सभी प्रधानों को भेज दिया जाता है ताकि कृषको को पूरी फसल में उपलब्ध
कराये जाने वाली पानी के बारे में जानकारी हो सके और तदानुसार किसान अपनी फसल को
नियोजित कर सकें। इस रोस्टर को खण्ड विकास अधिकारी के कार्यालय व तहसील आदि में भी
चस्पा किया जाता है तथा कमाण्ड क्षेत्र से सम्बघित जिलाधिकारियों, मुख्य विकास
अधिकारियों, जिला कृषि अधिकारियों आदि को भी भेजा जाता है जिससे इसका व्यापक
प्रसारण हो सकें।
सिंचाई के पश्चात् सिंचित क्षेत्र को सींचपाल दर्ज करता हैं तथा इसकी पैमाइश
विभागीय सींच पर्यवेक्षक द्वारा की जाती है सींच पर्यवेक्षक पैमाइश करने से पहले
ग्राम पंचायत पर चस्पा की जाने वाली नोटिस के माध्यम से कृषकों को पैमाइश की जाने
वाली तिथि की सूचना देते हैं इसकी सूचना सम्बन्धित तहसीलदार को भी दी जाती है ताकि
पैमाइश के समय स्थल पर लेखपाल भी उपलब्ध रहें। कृषकों से अपेक्षा की जाती है कि वे
सींच की पैमाइश के समय स्वयं उपस्थित रहें और यदि खेत को दर्ज करने में कोई भी गलती
हुई हो तो उसे इंगित करें ताकि उसका निस्तारण उसी समय किया जा सके। पैमाइश के
पश्चात् कृषकों को पर्चा भेजा जाता है, जिसमें सम्बन्धित कृषक को सिंचाई के बारे
में सूचना दी जाती है तथा उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि पर्चे में अंकित रकबा अथवा
जिन्स गलत लिखी हुई हो अथवा सिंचाई डाल (पलों) हुई हो या अन्य कोई त्रुटि हो तो इसकी
सूचना लिखित रूप से पर्चा मिलने के तीस (30) दिन के अन्दर दें। यदि खेत नहर के पानी
से बिल्कुल नही सींचा गया है परन्तु सिंचाई शुल्क लगाया गया है तो इसकी सूचना
इक्कीस (21) दिनों के अन्दर दें। यह सूचनायें अधिशासी अभियन्ता/सहायक अभियन्ता/उपराजस्व
अधिकारी/जिलेदार को दी जा सकती है। इन सभी शिकायतों की जांच श्किायत प्राप्त होने
के पन्द्रह दिनों के अन्दर की जाती है तथा फौरन इस पर निर्णय लिया जाता है, जिसकी
सूचना शि्ंाकायतकर्ता कृषक को भी शीध्र दी जाती है। पैमाइश के पश्चात् जमाबन्दी
बनाई जाती है जो रबी में पहली मई तथा खरीफ में 15 नवम्बर को तहसील भेजी जाती है।
सिंचाई शुल्क की वसूली तहसील के कर्मचारियों द्वारा की जाती है। उल्लेखनीय हैं, यदि
प्रार्थना पत्र सिंचाई की दर घटाने अथवा छूट के लिए है और फसल ऐसा प्रार्थना पत्र
प्राप्त करवाने के पन्द्रह दिनों के अन्दर काट दी जाती है तो सम्बन्धित प्रार्थना
पत्र निरस्त किया जा सकता है। अत: कृषकों से यह अपेक्षा की जाती है यदि कोई एतराज
हो तो उसे निर्धारित समय मे सक्षम अधिकारी को प्राप्त कराये एवं समय सीमा का पालन
करेंं।
(2) सेवा की सुनिश्चितता
यह खण्ड जनता की सेवा में सदैव प्रयत्नशील है। खंड के अधिकारी एवं कर्मचारी हर
सम्भव प्रयास करते है कि कृषकों को सामान्य स्थिति में कोई परेशानी न हो तथा वह अपने
क्रमानुसार अधिकतम सिंचाई के पानी का लाभ उठा सके। परन्तु प्रकृति के सामान्य
व्यवहार के विरूद्ध स्थिति उत्पन्न होने, प्राकृतिक आपदा एवं सिंचाई विभाग के
नियंत्रण के परे आकस्मिक स्थि्ंातियों में अधिकारियों द्वारा रोस्टर में परिवर्तन
किया जा सकता है। जिसमे अधिक जनसंख्या के फायदे को ध्यान में रखते हुए विवेकानुसार
निर्णय लिया जाता है। इसकी सूचना कृषकों को विभिन्न श्रोतों से दी जाती है। इसके
साथ ही जनता से यह अनुरोध भी है कि गूलों को काटकर अवैधानिक तरीक से पानी न ले, इससे
न केवल गूल क्षतिग्रस्त होती है बल्कि अन्य कृषकों को पर्याप्त मात्रा में उनके
क्रम का पानी नही मिल पाता। इस प्रकार अवैधानिक सींच करने हेतु सींच का प्रतिबन्धित
ढंग अपनाना, सरकारी सम्पत्ति को क्षति पहंुंचाना, नियमानुसार दण्डनीय अपराध है। कृषि
विशेषज्ञों न अब यह साबित कर दिया है कि फसल में उचित समय से वांछित मा़त्रा में
पानी देने से ही पैदावार अधिकतम होती है। यदि वांछित मात्रा से अधिक अथवा कम पानी
दिया जाता है तो उत्पादन में कमी आ जाती है। पानी की उचित मा़त्रा एवं सही समय के
लिए कृषक कृषि विभाग से मदद ले सकते हैं। आवश्यकता से अधिक पानी लेकर कृषक न केवल
अपना नुकसान करते हैं बल्कि अन्य कृषकों का भंी (पर्याप्त पानी न मिलने के कारण)
नुकसान करते हैं और इस प्रकार पानी के दुरूपयोग से राष्ट्रीय क्षति होती है।
(3) सूचना की आसानी से उपलब्धता
जनसूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अन्तर्गत शासन द्वारा निर्धारित प्रक्रियानुसार
शुल्क जमा कर खंड से सूचना प्राप्त की जा सकती है। जिसके लिये सहायक अभियंता
सम्बन्धित उपखंड के सहायक जनसूचना अधिकारी एवं अधिशासी अभियंता जन सूचना अधिकारी
है। अधीक्षण अभियंता, प्रथम मंडल, सिंचाई कार्य, मेरठ अपीलीय अधिकारी नियत है।
(4) जनप्रतिनिधियों व नागरिकों के साथ विचार–विमर्श
जनपद में जनप्रतिनिधियों व नागरिकों के साथ विचार–विमर्श तथा सुझाव हेतु जिला
सिंचाई बन्धु की कमेटी गठित है। जनपद के समस्त सांसद राज्य सभा सदस्य, विधायक,
विधान परिषद सदस्य, ब्लाक प्रमुख, आदि उसके सदस्य होते हैं तथा इस मीटिंग की
अध्यक्षता अध्यक्ष, जिला पंचायत मुजफरनगर द्वारा की जाती हैं। इस कमेटी के सचिव,
जनपदीय नोडल अधिशासी अभियन्ता सिंचाई विभाग होते है। इस मीटिंग में जनपद के अधिकारी
(अथवा उनके प्रतिनिधि) जिनका सम्बन्ध कृषि एवं सिंचाई से हो, उपस्थित होते हैं जिससे
जनता की समस्याओं की जानकारी ली जाती है और आपसी विचार–विमर्श से उनका निदान करने
की कार्यवाही की जाती है। विकास खंड स्तर पर प्रत्येक माह के द्वितीय बृहस्पतिवार
को सिंचाई विभाग आपके द्वार की बैठक होती है। इसी प्रकार प्रत्येक माह के प्रथम व
तृतीय मंगलवार को तहसील मुख्यालय पर तहसील दिवस आयोजित किया जाता है। इन बैठकों में
सामान्यत: जो समस्याये आती है उनका समाधान करने की प्रक्रिया नीचे दी जा रही है:
(अ) जनपद सिंचाई बन्धु
यह मीटिंग जनपद स्तर पर प्रत्येक महीने के द्वितीय बुद्धवार को होती है। आमतौर पर
कृषकों को निम्न प्रकार की समस्याओं पर चर्चा के उपरान्त यथासम्भव निराकरण हेतु
वांछित कार्यवाही की जाती है:
क. नहरों की समुचित सफाई का विवरण एवं कार्यक्रम।
ख. नहरों की कटिंग एवं टेल तक पानी पहंचाने की समस्यायें।
ग. रोस्टर के अनुसार नहरों का चलना।
घ. नहरों के कुलाबों की व्यवस्था से सम्बन्धित समस्यायें।
ड. राजकीय नलकूपों के संचालन से सम्बन्धित समस्यायें।
च. नलकूपों की बन्दी की समीक्षा।
छ. सिंचाई शुल्क निर्धारण सम्बन्धी समस्यायें।
ज. कृषकों से प्राप्त अन्य प्रकार की शिकायतों का निराकरण।
जनपद सिंचाई बन्धु की बैठक की कार्यवृति एक पंजिका में रखी जाती हैं। कृषकों की निजी
समस्याओं पर विचार–विमर्श उपरान्त समाधान हेतु निश्चित तिथि निर्धारित की जाती है।
यह प्रयास किया जाता है कि प्रत्येक बैठक में उठाई गई समस्याओं पर की गई कार्यवाही
की सूचना आगामी बैठक में प्रस्तुत की जायें। जिन समस्याओं का समाधान जनपद स्तर पर
सम्भव न हो, उनका विवरण सक्षम अधिकारियों को भेजे दिया जाता है ताकि उचित स्तर पर
निर्णय लेने की कार्यवाही की जा सकें।
(ब) तहसील दिवस
जनसस्याओं के निवारण हेतु जनपद में प्रत्येक माह के प्रथम एवं तृतीय मंगलवार को
तहसील मुख्यालय पर परगना मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में प्रात: 10 बजे से दोपहर 2 बजे
तक ‘तहसील दिवस‘ आयोजित किया जाता है, जिसमें क्षेत्राधिकारी तथा तहसील एवं विकास
खण्ड स्तरीय अधिकारी भाग लेते है। किसी एक तहसील में तहसील दिवस जिलाधिकारी की
अध्यक्षता में आयोजित किया जाता है। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में आयोजित तहसील दिवस
कार्यक्रम में सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियन्ता अनिवार्य रूप से भाग लेते हैं।
आयोजित तहसील दिवस में जो भी जन समस्यायें अथवा शिकायतेें प्राप्त होतीं है उनका
निस्तारण यथासम्भव मौके पर ही किया जाता है। यदि यह सम्भव न हो तो उसके निस्तारण के
लिए एक उपयुक्त समय सुनिश्चित किया जाता है और इस निश्चित समय में उस समस्या के
निस्तारण हेतु अधिकारी भी नियत कर दिये जाते हैं। तहसील दिवस में जो भी मामले
प्रस्तुत होते हैं उन सभी का पूरा रिकार्ड रखा जाता है ताकि निर्धारित समय में उसके
निस्तारण की समीक्षा भली–भांति की जा सके। मण्डल स्तरीय अधिकारी प्रत्येक मंगलवार
को किसी एक तहसील में भ्रमण करके ‘तहसील दिवस‘ में सम्मिलित होते हैं।
(स) सिंचाई विभाग आपके द्वार कार्यक्र्रम
विकास खंड को आधार मानकर प्रत्येक माह के द्वितीय गुरूवार को पूर्व निर्धारित स्थल
पर प्रात: 9–00 बजे से 2–00 बजे शाम तक क्षेत्र से सम्बन्धित सहायक अभियंा/उपराजस्व
अधिकारी/अवर अभियंता, जिलेदार, सींच पर्यवेक्षक तथा सींचपाल द्वारा क्षेत्रीय जनता
को आमंत्रित कर नलकूपो के परिचालन एवं अनुरक्षण, तथा सिंचाई आदि जनसस्याओं के
निवारण हेतु बैठक कर विचार–विमर्श उपरान्त समाधान का सार्थक प्रयास किया जाता है।
बैठक की प्रगति का विवरण उच्चाधिकारियों को प्रेषित किया जाता है।
(द)अधिकारियों के द्वारा कार्यालय में बैठकर समस्याओं का निराकरण
जनसमस्याओं एवं शिकायतोें के निवारण हेतु प्रत्येक अधिकारी अथवा उनका प्रतिनिधि
कार्यालय कक्ष में प्रतिदिन 10–00 बजे प्रात: से 12–00 बजे दोपहर तक उपस्थित रहते
है। प्रत्येक कार्यालय में मुलाकातियों का एक रजिस्टर एक निर्धारित प्रारूप में रखा
जाता है। मुलाकाती की समस्या के सम्बन्ध में यथा आवश्यक समुचित निर्देश
कार्यालयाध्यक्ष द्वारा निर्गत कर समाधान किया जाता है।
(5) शिकायतों की प्राप्ति एवं इसकी सूचना देने की सरल और सुविधापूर्ण कार्यविधि और
शिकायतों का समयबद्ध निवारण
रोस्टर में सिंचाई सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी देने के साथ–साथ नलकूपों के प्रभारी
अधिकारियों एवं कर्मचारियों के नाम, पते, टेलीफोन नम्बर आदि दिये जाते हैं ताकि
कृषकगण अपनी शिकायतों एवं समस्याओं के निराकरण हेतु उनसे आसानी से सम्पर्क स्थापित
कर सकें।
(5.1) कृषकों को आमतौर पर निम्न शिकायतें हो सकती है।
(5.2) शिकायतों के प्राप्त करने एवं निस्तारण हेतु ग्राम स्तर/ब्लाक स्तर/जिला स्तर
पर नामित अधिकारी
1.ग्राम स्तरसींच पर्यवेक्षक
2.ब्लाक स्तरअवर अभियन्ता/जिलेदार
3.तहसील स्तरसहायक अभियन्ता/उपराजस्व अधिकारी
4.जिला स्तरअधिशासी अभियन्ता
(5.3)कृषक (यदि ग्राम में समय से उपलब्ध हो) को सामान्य सूचना प्राप्ति के अधिकार
का विवरण
1.सिंचाई की पर्ची मिलना।
2.कुलाबा की तातील
3.रोस्टर के विरूद्ध नलकूप को बन्द करना।
4.तावान लगने, ओसराबन्दी की नोटिस
5.सिंचाई आदि के विरूद्ध दिये गये प्रार्थना पत्र का निस्तारण।
6.सींच पर्यवेक्षक द्वारा सींच की पैमाइश किये जाने की प्रस्तावित तिथि (ग्राम
पंचायत में चस्पा की गई नोटिस द्वारा)
7.रोस्टर की सूचना बी0डी0ओ0/ग्राम प्रधान के माध्यम से।
(6)नागरिक दलों को शामिल करके कार्य निषपादन की स्वतंत्र जांच पडताल
वर्तमान प्रणाली के अनुसार कृषकों के सिंचित क्षेत्र को सिंचाई कर लगाने हेतु
प्रत्येक फसल में कर्मचारियों द्वारा मापा जाता है। मापी के समय कृषक की उपस्थिति
का आह्वान किया जाता है और विभिन्न प्रकार की फसलों पर शासन द्वारा निर्धारित दरों
से सिंचाई शुल्क निर्धारित किया जाता है। उसकी जमाबन्दी कृषकों से वसूली हेतु
सम्बन्धित तहसीलदारों को भेजी जाती है। यथासम्भव प्रयास किया जाता है कि कृषकों के
नाम, फसल उसका क्षेत्र एवं सींच कर में त्रृटि न हो फिर भी यदि कृषकों को कही कोई
त्रृटि मिलती है तो उसका इस्तगासा (शिकायत) विभाग द्वारा स्वीकार किया जाता है और
उन पर एक नियत अवधि में जांच कर शिकायत का निस्तारण किया जाता हैं। कृषकों की
सिंचाई क्षेत्र की माप एवं अन्य शिकायतों का अनुश्रवण ‘उत्तर भारत नहर एवं जल निकास
अधिनियम 1873 एवं सिंचाई नियमावली संग्रह में निहित हैं समस्त अधिकारियों एवं
कर्मचारियों द्वारा उसका यथासम्भव पूर्ण रूप से पालन किया जाता है। उक्त के
अतिरिक्त कृषकों को उचित सुविधा प्रदान करने हेतु सींच की पड़ताल प्रक्रिया
निर्धारित है जिससे किसी भी कृषक पर अनावश्यक अथवा गलत महसूल आदि न लगें।
(7)महत्वपूर्ण सूचनाऐं
1.फसल को आवश्यकता से अधिक पानी देने पर कम उपज होती है।
2.कुलाबों की गूल ठीक दशा में न होने पर उसमें पानी देना बन्द किया जा सकता है
3.यदि किसी खेत का आंशिक भाग सींचा गया हो और बाकी भाग 15 से0मी0 से ऊॅची मेढ से
अलग न किया गया हो तो पूरे खेत पर सींच कर लगेगा।
4.यदि पूरी फसल नलकूप का पानी न लेना हो तो अधिशासी अभियंता को फसल आरम्भ होने से
पूर्व ही लिखित रूप में दे दें। इस अवस्था में सींचकर नही लगेगा। परन्तु इसके बाद
यदि नहर से पानी लिया गया तो सिंचाई का चार गुना दण्ड व सिंचाई कर अतिरिक्त लगेगा।
5.यदि किसी खेत की सिंचाई अवैधानिक ढंग से की गई हो तो सींचकर के अतिरिक्त चार गुना
तक तावान लगाया जायेगा।
6.यदि नलकूप का पानी बिना कोर खेत मे फैलता है तथा पानी की गहराई 15 से0मी0 से अधिक
हो तो उस फसल के लिये अधिकतम सींच कर का दो गुणा, यदि पानी की गहराई 30 से0मी0 से
अधिक हो तो तीन गुणा आबजाया कर लगेगा।
7.दैवी आपदा जैसे ओला, पाला, टिड्ढी आदि से फसल नष्ट होने की दशा में 50 प्रतिशत से
कम हानि पर शून्य, 50 प्रतिशत से अधिक व 75 प्रतिशत से कम हानि पर आधा तथा 75
प्रतिशत या उससे अधिक हानि पर पूर्ण सींचकर में छूट देय है।
(8)क्या करें
1.सिंचाई से पूर्व गूलों की सफाई करें।
2.पानी उचित गहराई में ही लगायें।
3.खेत की सिंचाई के बाद यदि अन्य कृषक को पानी की आवश्यकता न हो तो कुलाबा बन्द कर
दें।
4.पानी न मिलने, गूलों में कटिंग/खांदी होने पर अवर अभियंता/जिलेदार को सूचित करें।
(9)क्या न करेंं
1.समुचित सिंचाई हेतु गूलों को बिस्मार न करें।
2.पानी के सामान्य बहाव में रूकावट हेतु गूलों में बन्धा न लगायें।
3.गूलों की पटरियों को क्षतिग्रस्त न करें।
4.कुलाबों के स्थान में स्वयं परिवर्तन न करेे।
5.नहर के पानी का अनावश्यक रूप से दुरूपयोग न करें।
अधिशासी अभियंता,
नलकूप खण्ड, मुजफरनगर