डिप्टी कमिश्नर (प्रशासन) वाणिज्य कर - वाणिज्य कर विभाग मुजपफरनगर
कर्यालयअध्यक्ष का ईमेल पता

विभागीय वेब साईट का पता

कार्यालय का पता फैक्स आदि

श्री रामाश्रय प्रसाद यू0पी0 सिटी एम जैड. इन आई सी आई.इनज्वाइंट कमिश्नर (कार्यपालक) वा0कर मु0नगर सम्भाग मु0नगरफैक्स न0 01312436445
विभागा अध्यक्ष का ई मेल पता, विभागीय वेब साईट का पता मुख्यालय का पताफैक्स आदिकमिश्नर वाणिज्य कर उत्तर प्रदेश लखनऊकाम्पटेक यू0पी0 एन आई सी. इनफैक्स न0 052227211472236977
जन सूचना अधिकारी,                      एम. एस. वर्मा

सहजनसूचना अधिकारी,                 डिप्टी कमिश्नर (प्रशासन) वा0कर मु0 नगर

अपीलीय (अधिकारी) का विवरण  श्री रामाश्रय प्रसाद      ज्वाइंट कमिश्नर (कार्यपालक) वाणिज्यकर मु0नगर सम्भाग मु0 नगर
 



विभाग/ कार्यालय के क्रिया कलाप जिनके लिए शासन ने विभाग

प्रस्तावना: भारत में सन् 2000 मे ही वेट को सभी राज्यों में लागू करने की योजना थी लेकिन प्रशासनिक कठिनाईयों तथा राजस्व में कमी आने के डर से इसका क्रियानवन कई बार टला और बाद में अपनाया गया। वर्ष 2006.07 के प्रथम सात महीनों (ंअप्रैल 2006 से अक्टूबर 2006) में देश में 30 राज्यों / केन्द्र शासित प्रदेशों में वेट लागू हो चुका है उत्तर प्रदेश में भी वर्तमान सरकार ने 01 जनवरी 2008 से इसकेे क्रियानवन को हरी झंडी दे दी गई। तथा इस सरकार ने इस व्यवस्था के क्रियानवन के लिए उत्तर प्रदेश वैल्यू ऐडेड टैक्स एक्ट 2007 बना लिया है। प्रदेश में वेट लागू होने के पहले उत्तर प्रदेश व्यापार कर अधिनियम 1948 के अन्तर्गत व्यापार कर की एक सूत्राीय व्यवस्था थी जिसके अन्र्तगत निर्माता, आयाकर्ता प्रथम क्रेता अथवा उपभोक्ता को सीधी बिक्री करने वाले व्यापारियों आदि पर एक बार व्यापार कर लगाया जाता था, परन्तु वैट प्रणाली में कर केवल उत्पादन प्रक्रिया में की गई मूल्य वृद्धि पर ही लगाया जाता है।


मूल्य वार्धित कर (वेट)
मूल्य वर्धित कर वस्तुत: विक्रय कर का एक विकल्प है यह एक ऐसी कर प्रणाली है जिसके अनुसार कर केवल उत्पादन प्रक्रिया में की गई मूल्य वृद्धि पर ही लगाया जाता है। मूल्य की यह वृद्धि उत्पादक या विक्रेता द्वारा की जाती है। वेट व्यापार कर की ऐसी विद्या है जिसमें कच्चे माल से जब दूसरा उत्पाद तैयार किया जाता है तो तैयार उत्पाद की कीमत में जो वृद्धि होती है, उसी बढे मूल्य पर ही कर की अदायगी करनी पड़ती है बशर्ते नया उत्पाद तैयार करने वाला व्यवसायी यह घोषणा करे कि जहाँ से कच्चा माल खरीदा गया वहाँ निर्धारित कर का भुगतान किया जा चुका है।


1. पंजीयन:पजीयन से आशय है कि प्रत्येक व्यापारी को अपने करोबार के सम्बन्ध में वाणिज्य कर विभाग में पंजीकृत कराना होता है। इससे उसको टिन नम्बर मिलता है जो फर्म पंजीकृत होती है। उसे शासकीय संरक्षण मिलता है। तथा सरकार द्वारा प्रद्त अन्य ससुविधओं का लाभ मिलता है जैसे किसी भी शासकीय कॉन्ट्रेक्ट लेने मे उसे प्राथमिकता मिलती है।
2. माल के आयात निर्यात में जोखिम कम रहता है।
3. व्यापारी की एंवम उसके माल की गुणवत्ता पर कोई प्रश्न चिन्ह नही लगता है। वैट के अन्र्तगत पंजीयन से सम्बन्धित निम्न बिन्दु महत्वपूर्ण है।
1. पंजीकरण के लिए वैट अधिनियम की धारा 17 एवं धारा 18 में प्राविधान है।
2. पंजीकरण कराने के लिए न्यूनतम वार्षिक विक्रय धन रूपये 5 लाख प्रान्त के भीतर से खरीद व प्रान्त के भीतर बिक्री के मामले में हैं।
3. पंजीयन प्राप्त करने के लिए व्यापारी पर जिस तिथि से कर दायित्व आ रहा है उस तिथि से 30 दिन के भीतर फार्म7 या फार्म7जी भर कर पंजीकरण अधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना होगा।
4. ट्रांसपोर्टर के पंजीयन की व्यवस्था, कन्साइनर या कन्साइनी फर्जी पाये जाने पर कर दायित्व ट्रांसपोर्टर पर निर्धारित किये जाने की व्यवस्था है।
5. स्वैचिछक पंजीयन की व्यवस्था, पंजीयन योग्य सीमा से कम विक्रय धन वाले व्यापारी भी पंजीयन प्राप्त कर सकते हैं।
6. उत्तरप्रदेश व्यापारकर अधिनियम, 1948 में पंजीकृत जिन व्यापारियों पर वैट अधिनियम लागू होने की तिथि से कर दायित्व आ रहा है उनके द्वारा पंजीकृरण हेतु पूर्णरूप् से भरा हुआ फार्म7 या फार्म7जी को फार्म8 के साथ उत्तर प्रदेश व्यापार कर अधिनियम में जारी पंजीकृरण प्रमाणपत्र को संलग्न कर वैट अधिनियम लागू होने के 60 दिन के भीतर पंजीकरण अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। पंजीयन अधिकारी निर्धारित फार्म में वही Tax Index Number  नम्बर का प्रमाणपत्र जारी करेगा।
7. वैट अधिनियम में पंजीयन का नवीनीकरण नही करना होता है। एक बार जारी पंजीयन प्रमाणपत्र तब तक वैध रहेगा जब तक व्यापारी व्यापार बन्द न कर दे अथवा उनका पंजीयन विभाग द्वारा निरस्त न कर दिया जाये।
8. पंजीयन हेतु पृथक पंजीयन अधिकारी की व्यवस्था है।
9. पंजीकरण प्राप्त करने हेतु पंजीकरण शुल्क रूपये 100/ है तथा 30 दिन में प्रार्थनापत्र न देने पर रूपये 100/प्रतिदिन विलम्ब शुल्क देना पड़ेगा।
10. पंजीयन प्राप्त करने हेतु निम्न अभिलेख/प्रमाण देना होता है
(क) पूर्ण रूप से भरा हुआ फार्म7 या फार्म7जी।
(ख) पंजीयन शुल्क जमा होने का प्रमाण।
(ग) यदि कोई विलम्ब शुल्क अथवा अर्थ दण्ड देय है तो उसके जमा का प्रमाणपत्र।
(घ) मतदाता पहचानपत्र, पैन कार्ड, पासपोर्ट, बैंक पासबुक में से किन्ही दो दस्तावेजों की अभिप्रमाणित प्रति।
2. मासिक नक्शे.वाणिज्य कर विभाग में पंजीकृत प्रत्येक व्यापारी को प्रत्येक माह में उसके द्वारा किये गये कारोबार (खरीद/बिक्री) से सम्बन्धित प्रत्येक क्रियाकलापों का विवरण (नक्शे) दाखिल करना अनिवार्य होता है। मासिक नक्शे से सम्बन्धित मुख्य बिन्दु निम्नवत् हैं

1. अधिनियम के अन्र्तगत केवल ऐसे व्यापारी जिनकी वार्षिक टर्नओवर रू0 एक करोड़ या उससे अधिक हैं, को मासिक नक्शे दाखिल करने की व्यवस्था है जबकि पूर्व अधिनियम में यह व्यवस्था रू0 दस लाख विक्रय धन पर थी।
2. रू0 25 लाख एवं रू0 एक करोड़ के विक्रय धन वाले व्यापारियों के लिए मासिक कर एवं त्रैमासिक नक्शे दाखिल करने की व्यवस्था है।
3. रू0 5 लाख से 25 लाख विक्रय धन वाले व्यापारियों के लिए त्रैमासिक कर व त्रैमासिक नक्शे जमा करने की व्यवस्था की है।
4. जो वयापारी माह की किसी तिथि से व्यापार प्रारम्भ करते है उनके लिए प्रथम टैक्स पीरियड उस माह का अवशेष भाग होगा और उसके पश्चात् प्रत्येक कैलेण्डर माह ही उनका टैक्स पीरियड होगा।
3. जमानतवैट अधिनियम की धारा 19 के अनुसार निम्नलिखित प्रयोजनों हेतु व्यापारियों से जमानत/अतिरिक्त जमानत माँगी जा सकती है।
पंजीयन देने या जारी रखने हेतु।
फार्माें की उचित कस्टडी हेतु।
क्र अर्थ दण्ड या अन्य देयों की वसूली के लिए।
अधिनियम के अन्तर्गत जमानत की अधिनियम सीमा एक वर्ष अधिकतम सीमा एक वर्ष में देय कर के बराबर अथवा जिस प्रयोजन हेतु माँगी जा रही है उसकी स्थिति के अनुसार होती है। वैट अधिनियम के अन्र्तगत जमानत हेतु प्रमुख बिन्दु निम्नवत् हैं
उत्तर प्रदेश व्यापार कर अधिनियम में यदि किसी वयापारी ने जमानत दे रखी है तो वैट अधिनियम की धारा 19 के अनुसार यदि ऐसी जमानत को जारी रखने की सूचना व्यापारी द्वारा अपने कर निर्धारण अधिकारी को धारा 81 (5) में निर्धारित प्रारूप में जमानतियों की अंडरटेकिंग के साथ दी जाती है तो पूर्व में दी गई जमानत वैध मानी जायेगी।
जमानत केवल उन्हीं मामलों में माँगी जाएगी जिन मामलों में राजस्व की सुरक्षा के लिए जमानत माँगा जाना आवश्यक हो और जमानत का कारण लिखित रूप से देना होगा।
जमानती की मृत्यु होने या उसके दिवालिया होने के 30 दिन के अन्दर कर निर्धारण अधिकारी को सूचना व घटना की तिथि से 60 दिन के भीतर नई जमानत देनी होगी।



वैट में जमानत व्यवस्था
जमानत माँगने के पूर्व व्यापारी को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाएगा।
कर निर्धारक अधिकारी को सूचना देने पर पूर्व में दी गई जमानत वैध मानी जाएगी।
प्रयोजन समाप्त हो जाने पर व्यापारी के प्रार्थनापत्र पर जमानत की राशि कर निर्धारक अधिकारी द्वारा वापस कर दी जाएगी।
यदि कोई व्यापारी माँगी गई जमानत नहीं देता है तो पंजीयन निलम्बित किया जा सकता है तथा विभागीय फार्म देने से मना किया जा सकता है।
सत्यापन पर दी गई जमानत यदि गलत पायी जाती है तो कर निर्धारक अधिकारी द्वारा नई जमानत नकद/एफ0डी0आर0/ एन0एस0सी0 आदि के रूप से माँगी जा सकती हैं।
जमानत के स्वरूप मूल्य संबधित कर अधिनियम के नियम 37 के अनुसार जमानत निम्न प्रकार से दी जा सकती हैं
1. निजी सम्पत्ति पर विभाग का बकाया की प्रथम चार्ज बनाकरं।
2. तीन वर्ष पुराने तीन पंजीकृत व्यापारियों, जो डिफाल्टर न हो, का सिक्योरिटी ब्राण्ड।
3. जिलाधिकारी से सत्यापित दो व्यक्तियों का सिक्योरिटी ब्राण्ड।
4. व्यापारी अपनी इच्छानुसार नगद, बैंक गारन्टी, एफ0डी0आर0, एन0एस0सी0 के रूप में भी जमानत दे सकता है।


4. टैक्स इनवाइसवैट के अन्र्तगत कर केवल प्रत्येक स्टेज के किए गए वेल्यू एडिशन पर लगाया जाता है। इसके लिए इसके लिए प्रत्येक डीलर को अपने खरीदार के अनुरोध पर, सामान और दी गई सेवाओं के विवरण, मात्रा, परिमाण और मूल्य के ब्योरे और देय टैक्स की राशि का इनवॉइस Invoice  देना होगा। इस इनवॉइस को टैक्स इनवॉइस कहते हैंं। इस टैक्स इनवॉइस के आधार पर पंजीकृत विक्रेता डीलर किसी रिर्टन पीरियड के अन्दर अपनी समस्त बिक्री पर आउट पुट टैक्स Out Put Tax  देयता का निर्धारण करता है। इसी प्रकार इस टैक्स इनवॉइस के आधार पर पंजीकृत क्रेता डीलर किसी रिर्टन पीरियड के अन्र्तगत अपनी सभी खरीदों
पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का निर्धारण करता है। टैक्स इनवॉइस डुप्लीकेट में जारी किया जाता है, क्रेता डीलर को मूल प्रति दी जाती है एवं विक्रेता डीलर डुप्लीकेट रखता है।
 

5. रिर्टन कर निर्धारणवैट का उद्देश्य टैक्स का हिसाब और टैक्स रिर्टन फाइल करने की प्रक्रिया को सरल बनाना है। व्यापारी द्वारा की गई वैल्यू एडिशन पर देय टैक्स राशि का हिसाब लगाना इतना आसान कभी न था। किसी रिर्टन पीरिएड के अन्र्तगत वह अपनी सभी खरीद और बिक्री पर टैक्स इनवॉइस के आधार पर सरल गणनाएं करे और अपने आप पता चल जाएगा कि उसको कितना टैक्स देना है या रिफण्ड लेना है। उसके द्वारा फाइल किया गया रिर्टन उसका स्वयं कर निर्धारण माना जाएगा।
 

वैट में कर निर्धारण व्यवस्था के मुख्य बिन्दु
1.सभी टैक्स रिर्टन व वार्षिक रिर्टन सही व समय से दाखिल करने वाले व्यापारियों को स्वत: कर निर्धारण लाभ मिलेगा।
2. स्वत: कर निर्धारण के लिए अलग से कोई कर निर्धारण आदेश जारी नहीं होगा।
3. वार्षिक रिर्टन जमा करने की तिथि के पश्चात् पड़ने वाले कर निर्धारण वर्ष की अन्तिम तिथि कर निर्धारण आदेश की तिथि मानी जाएगी।
4.निम्न मामलों में कर निर्धारण लेख बहियाँ देखकर किया जाएगा
(क) जिन व्यापारियों के विरूद्ध अभिलेख पर कोई प्रतिकूल तथ्य हो।
(ख) जो वार्षिक रिर्टन दाखिल नहीं करते।
(ग) जो एक या कई टैक्स पीरिएड का रिर्टन नही देते।
(घ) जो व्यापारी सर्वे, आडिट, निरीक्षण का विरोध करते हैं या बाधा डालते हैं।
(ड0) जिन मामलों में बहती पास नही करायी गई है।
5. जो वयापारी पंजीकृत नही है और प्रान्त के बाहर से माल आयात करते हैं उनका भी कर निर्धारण होगा।
6. अन्तिम कर निर्धारण आदेश वर्ष की समाप्ति के तीन वर्ष के अन्दर पारित किया जा सकता है।
 

 

टैक्स रिर्टन के साथ खरीदबिक्री की सूची दाखिल करना अनिवार्य है। खरीद की सूची में निम्न सूचनाएँ दी जानी होगी
1. विक्रेता व्यापारी का नाम व पता जिससे माल खरीदा गया।
2. विक्रेता व्यापारी का टिन नम्बर।
3. टैक्स इनवॉइस नम्बर/दिनाँक।
4. माल का विवरण।
5. कर योग्य मूल्य।
6. कर की धनराशि।
 

बिक्री की सूची में निम्न सूचनाएं दी जानी होंगी
1. क्रेता व्यापारी का नाम व पता जिसे माह में बेचा।
2. क्रेता व्यापारी का टिन नम्बर यदि हो तो।
3. टैक्स इनवॉइस नम्बर/दिनाँक।
4. माल का विवरण
5. माल का कर योग्य मूल्य।
6. कर की धनराशि।
7. योग।
 

 

6. टी0डी0एस0.टी0डी0एस0 का अर्थ है टैक्स डिक्शन ऐट सोर्स। कर वसूली आसानी से करने के उद्देश्य से राज्य सरकार विशेष प्रकार के संव्यवहारों पर या विशेष प्रकार के व्यापारियों के द्वारा की गई बिक्री की धनराशि क्रेता द्वारा भुगतान करते समय कर के बराबर या एक निश्चित दर से धनराशि काट करके शेष भुगतान किया जाता है। कटौती से प्राप्त धनराशि विक्रेता की तरफ से जमा किया जाता है। यह धनराशि विक्रेता व्यापारी के कर दायित्व में समायोजित होता है।
टी0डी0एस0 से संबंधित मुख्य बिन्दु निम्नवत् हैं
यदि कर दायित्व कम होता है तो टी0डी0एस0 वापस किया जाता है।
जिन संस्थाओं/व्यापारियों को टी0डी0एस0 काटने के लिए विज्ञप्ति जारी की जाएगी उन्हीं टी0डी0एस0 काटा जाता है।
टी0डी0एस0 न काटने पर दो गुना धनराशि का अर्थदण्ड लगेगा।
टी0डी0एस0 की धनराशि विलम्ब से जमा करने पर 15 प्रतिशत प्रतिवर्ष या 1.25 प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज की दर ली जायेगी।
टी0डी0एस0 जिस महीने में काटा जायेगा। उसके अगले महीने के 20 तारीख के बाद से जमा करने की तिथि तय की जायेगी।
यदि टी0डी0एस0, दण्ड, ब्याज नही जमा किया जाता है तो उसकी वसूली कुर्की (वसूली प्रमाणपत्र) काट करके भू7राजस्व के बकाया की भांति वसूल की जायेगी।
टी0डी0एस0 नम्बर लेने के लिए फार्म संख्या निर्धारित ग्ग्प्ग् है।


7. रिफण्डप्रस्तावित वैट अधिनियम की धारा 40 व 41 तथा प्रस्तावित वैट नियमावली के नियम 49 व 50 में रिफण्ड तथा विलम्ब से ब्याज देने के बारे में प्राविधान किये गये हैं।
रिफण्ड से संबंधित मुख्य बिन्दु निम्नवत् है :
रिफण्ड देय होने के 30 दिन के अन्दर रिफण्ड व्यापारी को प्राप्त होगा। लेकिन यदि फर्म बन्द हो गयी है तो आदेश होने की 90 दिन की अवधि के भीतर रिफण्ड दिया जाएगा।
इनपुट टैक्स क्रेडिट से संबंधित रिफण्ड को अगले वर्ष के टैक्स के विरूद्ध समायोजित किया जा सकता है।
रिफण्ड की धनराशि सीधे व्यापारी के बैंक खाते में ट्रेजरी चेक द्वारा ट्रान्सफर की जायेगी।
जिस दिन रिफण्ड देने का आदेश कर निर्धारण अधिकारी द्वारा पारित किया जायेगा उसी दिन से रिफण्ड ड्यू माना जाएगा।
यदि किसी अन्य अधिकारी या न्यायालयस द्वारा रिफण्ड आदेश पारित किया जा रहा है तो उस आदेश के कर निर्धारण अधिकारी के कार्यालय में प्राप्त होने के दिनाँक को रिफण्ड ड्यू होगा।
रिफण्ड की प्रक्रिया निम्नवत् है
रिफण्ड ड्यू due होने की तिथि से 21 दिन के भीतर कर निर्धारण अधिकारी फिण्ड पेमेण्ट आउ‍र्र बनायेगा और यह आर्डर उसी अवधि में जिले के आहरण वितरण अधिकारी को प्रापत करा देगें।
आहरण वितरण अधिकारी ऐसे आदेश की प्राप्ति के 5 दिन के भीतर बिल बनाकर रिफण्ड पेमेन्ट आर्डर की कापी के साथ ट्रेजरी आॅफिसर को प्राप्त करायेगे।
ट्रेजरी आॅफिसर बिल/आर्डर प्राप्त होने के 4 दिन भीतर एकाउण्ट पेयी चेक उस बैंक के नाम बनाएगा जिस बैंक में व्यापारी का खाता है।
 

 

8. लेखा पुस्तिका व अभिलेखों का रखरखाव.वैट अधिनियम/वैट नियमावली के अन्र्तगत विभिन्न प्रकार के व्यापारियों द्वारा रखें जाने हेतु टैक्स इनवॉइस, सेल इनवॉइस, बिल, केशमेमों, परचेज इनवॉइस, चालान या ट्रान्सपोर्ट मेमो, विभागीय फार्मों का रजिस्टर व आर्डर रिपोर्ट निर्धारित किये गये हैं।



वैट की गणना विधि
 

वैट की गणना में हर एक स्तर पर देय वैट में से पिछला दिया वैट घटाकर देय वैट निकाला जाता है। पिछले वैट घटाने को इनपुट टैक्स क्रेडिट कहते हैं। वैंट की गणना की विधि निम्न चित्रा द्वारा स्पष्ट की जा सकती है

(1) कच्चे माल का उत्पादक विक्रय मूल्य रू0 1000 वैट /10 प्रतिशत रू0 100 शुद्ध वैट देय रू0 100(2)

उत्पादकManufacturer विक्रय मूल्य रू0 2000वैट/ 10 प्रतिशत रू0 200इनपुट टैक्स क्रेडिट रू0 100शुद्ध वैट देय रू0 100



(3) थोक विक्रेता का उत्पादक Wholesalerविक्रय मूल्य रू0 2500 वैट /10 प्रतिशत रू0 250 इनपुट टैक्स क्रेडिट रू0 200 शुद्ध वैट देय रू0 50थोक

विक्रेता का उत्पादकWholesalerविक्रय मूल्य रू0 3000 वैट /10 प्रतिशत रू0 300 इनपुट टैक्स क्रेडिट रू0 250 शुद्ध वैट देय रू0 50


इस प्रकार, व्यापार के हर एक स्तर पर वैट देय होगा, अर्थात् वैट बहु बिन्दु कर हैं Multi Point Tax
कुल वैट की राशि100 + 100 + 50 + 50 रू0 300 होगी।

वैट प्रणाली की विशेषताएं
1. व्यापारियों के हित में1. कर योग्य विक्रय धन की सीमा बढ़ाकर 2/3 लाख रूपये से 5 लाख रूपये की गयी है।
2. कर मुक्त के फार्म (3क, 3ख, 3ग, 3घ) समाप्त किये गये है।
3. सभी प्रकार के कच्चे माल पर कर की दर घटाकर 4 प्रतिशत की गयी है।
4. सभी प्रकार के सूचना प्रौद्योगिकी वस्तुओं पर कर की दर घटाकर 4 प्रतिशत की गयी है।
5.पंजीयन के लिए अलग से रजिस्टरिंग आथारिटी का गठन किया जा रहा है जिसके द्वारा 30 दिन के अन्दर पंजीयन प्रार्थनापत्र के निस्तारण की व्यवस्था है।
6.सेमी फिनिश्ड माल पर भी आई0टी0सी0 देने की व्यवस्था।
7. कनसाइनमेन्ट पर इनपुट टैक्स, क्रेडिट 3 प्रतिशत से अधिक अदा किये गये कर पर, जबकि अन्य राज्यों में यह व्यवस्था 4 प्रतिशत से अधिक अदा किये गये कर पर हैं।
8.पंजीयन प्रार्थनापत्र एकपक्षीय खारिज होने पर पुन: सुनवाई करने का प्राविधान।
9. मासिक कर व नक्शा देने वाले व्यापारियों के लिए विक्रय धन की सीमा रू 10 लाख से बढ़ा कर रू0 1 करोड़ का प्राविधान।
10.शतप्रतिशत वादों का स्वत: कर निर्धारण किये गये।
11.टैक्स, आडिट/स्क्रूअनी के लिए व्यापारियों का चयन कमिश्नर द्वारा किये गये।
12.व्यापारियों के विरूद्ध अभियोजन के प्राविधान समाप्त किये गये हैं।
13.विशेष जाँच के फलस्वरूप रू0 1 लाख से अधिक करापवंचन के मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए निपटारा आयोग गठन है।
14.रिफण्ड के भुगतान की सीमा 90 दिन से घटाकर 30 दिन का प्राविधान और रिफण्ड का भुगतान सीधे व्यापारी के खाते में किये जाने की व्यवस्था।
15.रू0 50 लाख तक वार्षिक विक्रय धन वाले ट्रेडर्स के लिए समाधान योजना का प्राविधान।
2. किसानों के हित में.1. केमिकल फर्टिलाइजर पर कर की दर में कमी करते हुए उसे 6.5 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत किया गया है।
2. इनसेकटीसाइड व पेस्टीसाइड पर कर की दर को कम करते हुए 5 प्रतिशत के स्थान 4 प्रतिशत किया गया है।
3. वाटर पम्प पर कर की दर को कम करते हुए 8प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत किया गया हैं।
4. ट्रैक्टर, हारवेस्टर व थ्रेशर पर कर की दर को 5 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत किया गया है।
5. सभी प्रकार के बीजों को कर मुक्त किया गया है।
6. मोटा अनाज (ज्वार, बाजरा, मक्का, जौं) को कर मुक्त किया गया है।
7. बाँस पर कर की दर 8 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत की गयी है।
3. महिलाओं के हित में.1. काँच की चूडि़यों, बिन्दी, सिन्दूर आदि को कर से मुक्त किया गया है।

2. सौन्दर्य प्रसाधनों एवं प्रसाधन सामग्रियों पर कर की दर 16 प्रतिशत की दर से घटाकर 12.5 प्रतिशत की गयी है।
3. सिलाई मशीन पर कर की दर 10 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गयी है।
3. महिलाओं के हित में.1. पी0डी0एच0 द्वारा किरोसिन आॅयल की गई बिक्री पर 10 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की दर से कर का प्राविधान है।
2. सभी प्रकार के दुग्ध उत्पाद यथा खोया, पनीर घी, मिल्क पाउडर आदि पर 8 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गयी है।
3. दवाओं पर कर की दर 8 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गयी है।
4. साईकिल पर कर की दर 8 प्रतिशत से 4 प्रतिशत की गयी है।
5. माचिस पर कर की दर 8 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गयी है।
6. मसालों पर कर की दर 5 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गई है।
7. वनस्पति व खाद्य तेल पर कर की दर 5 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गयी है।
8.इण्डस्ट्रियल केबिल, इनवर्टर, ट्रान्सफारमर, ट्रान्समिशन वायर व बिजली के सामान पर कर की दर 10प्रतिशत के स्थान पर 4प्रतिशत की गयी है।
9. पैकिंग मैटेरियल पर कर की दर 4प्रतिशत की गयी है।
10. चाय पर कर की दर 10 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत की गयी है।
11. चिकन एवं हैण्डलूम गुड्स को कर मुक्त रखा गया है।
12. सभी प्रकार के हैण्डलूम उत्पादकों पर कर से छूट।
13. चिकन कपड़े व बनारसी साड़ी पर कर से छूट।
14. छात्रों द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं जैसेपेन, कम्प्यूटर, कम्प्यूटर स्टेशनरी, सी0डी0, डी0वी0डी0 पर कर की दर में कमी।
5. उद्योगों के हित में.1. केपिटल गुड्स पर दिये गये कर को वापस या समायोजित किये जाने का प्राविधान।
2. कच्चे माल पर दिये गये कर की वापसी या समायोजन।
3. निर्यात पर कर भार की समाप्ति का प्राविधान।
4. सूचना प्रौद्योगिकी की वस्तुओं पर कर की दर 4प्रतिशत का प्राविधान है।
6. राष्ट्रीय कर परिषद.वैट से जुड़े मामले देखने के लिए राज्य कर परिषद का गठन किया गया है। प्रमुख सचिव वाणिज्य कर इस परिषद के पदेन अध्यक्ष होंगे, आयुक्त वाणिज्य कर, अपर आयुक्त (विधि) अपर निदेशक


(प्रशिक्षण) पदेन सदस्य होंगे। अन्य चार सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार करेगी।परिषद कर संग्रह प्रणाली, कर की दरों में परिवर्तन, नियमावली में संशोधन, योजनाओं व अभिसूचनाओं के सम्बन्ध में शीर्ष परामर्शदात्री संस्था होगी।
7. राज्य के संग्रह पर प्रभावजब कभी भी एक व्यवस्था को हटाकर दूसरी व्यवस्था लागू की जाती है तो अल्पकाल में कुछ हानि सम्ीाव है। बिक्री/व्यापार कर की जगह वैट लगने से राज्य सरकार को आय में कुछ कमी हो सकती है इसलिए केन्द्र सरकार ने राज्यों को होने वाली इस कमी को दूर करने के लिए 3 वर्षों तक उसकी भरपाई के लिए धन उपलब्ध कराने के लिए व्यवस्था की है। अर्थात् प्रथम वर्ष में राज्यों की आय में जितनी कमी आयेगी केन्द्र सरकार उसकी शतप्रतिशत, दूसरे वर्ष में 75 प्रतिशत तथा तीसरे वर्ष में 50 प्रतिशत क्षतिपूर्ति करेगी जब वैट व्यवस्था पूरी तरह लागू हो जायेगी जैसा कि भारत के अन्य राज्यों में वैट व्यवस्था के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वर्ष 2005.06 में इन राज्यों में कर संग्रह में 17 प्रतिशत से 19 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है तथा वर्ष 2006.07 में यह वृद्धि 21 प्रतिशत हो गई है। उ0प्र0 चूंकि उपभोक्ता प्रधान राज्य है इसलिए इस बात की पूरी सम्भावना है कि वैट लागू होने से राज्य सरकार के कर राजस्व में वृद्धि होगी, इससे सरकार अपने व्यय भी बड़ा सकती है तथा अधिक जन कल्याणकारी कार्य कर सकती हैं।
इनपुट टैक्स क्रेडिट ITC
पंजीकृत व्यापारी जो प्रान्त के भीतर के पंजीकुत व्यापारी से की गई खरीद पर उसे कर अदा करता है तथा कर योग्य खरीद पर सीधे राज्य कोषागाार में जमा किया गया कर की धनराशि को इनपुट टैक्स कहा जाता है। इनपुट टैक्स का लाभ व्यापारी को उसी माल को निर्धारित दशाआ में निस्तारण करने पर व्यापारी को वापसी/समायोजन देय होता है। इसे इनपुट टैक्स कहा जाता है।
शर्तें
1. विक्रेता/क्रेता व्यापारी पंजीकृत हो
2. नान वैट गुड्स को छोड़ करके कर योग्य माल
3. प्रान्त के भीतर पंजीकृत व्यापारी से खरीद हो
4. टैक्स इनवॉइस हो
5. माल की बिक्री उसी दशा में प्रान्त के भीतर, केन्द्रीय बिक्री या भारत के बाहर के निर्यात के दौरान की गयी हो।

6. यदि माल उत्पादन/पैंकिंग/प्रोसेसिंग में उपयोग किया गया है तो ऐसे उत्पादित, प्रोसेस्ड/पैक्ड माल की बिक्री प्रान्त के भीतर, केन्द्रीय या भारत बाहर निर्यात के दौरान की गयी हो।
7. यदि कन्साइनमेन्ट/स्टाक ट्रांसफर किया जाता है। 4 प्रतिशत से अधिक दर से दिये गये कर के बराबर ITC देय होगा। राज्य सरकार चाहे तो विज्ञप्ति करके 4 प्रतिशत की दर कम कर सकती है।
8. कैपिटल गुड्स पर ITC देय है यदि उत्पादित माल की बिक्री प्रान्त के भीतर, केन्द्रीय या निर्यात के दौरान की गयी है तथा कर मुक्त केवल निर्यात के दौरान बेचे जाने पर ही ITC  देय है माल को कन्साइनमेन्ट/स्टाक ट्रांसफर करने पर भी ITC देय होगा।
9.कैपिटल गुड्स की खरीद VATA Act  लागू होने के बाद की गयी खरीद पर देया होगा अर्थात् UPTT Act  के अन्र्तगत खरीदे गये कैपिटल गुड्स पर कोई ITC देय नहीं हैं।
10.कैपिटल गुड्स पर ITC उस तिथि से देय होगा जिस तिथि से व्यापारी पर कर देयता बनती है।
11.निर्यात के दौरान की गयी बिक्री को छोड़ करके शेष किसी परिस्थिति में कर मुक्त माल की बिक्री पर ITC देय नही होगा।
स्टाक पर इनपुट टैक्स क्रेडिट
(A) वैट ऐक्टलागू होने की तिथि पर
1. कैपिटल गुड्स, कैपिटल पावर प्लान्ट तथा नानवैट गुड्स के स्टाक पर ITC  देय नही है।
2. केवल कर योग्य माल पर ITC  देय होगी।
3. वैट लागू होने की तिथि से 6 माह पीछे तक की गयी खरीद पर ITC देय है।
4. स्टाक पर केवल उसी खरीद पर देय होगी जिसकी बिक्री प्रान्त के भीतर, केन्द्रीय बिक्री या भारत के बाहर निर्यात के दौरान की जाय।
5. यदि स्टाक निर्मित माल/अर्धनिर्मित माल/पैकिंग के रूप में प्रयोग होने के बाद स्टाक में है तो ऐसा माल प्रान्त के भीतर, केन्द्रीय बिक्री या भारत के बाहर निर्यात के दौरान की गयी बिक्र से सम्बन्धित खरीद पर ही ITC देय होगा।
6. यदि स्टाक का ट्रांसफर/कनसाइनमेन्ट किया जा रहा है तो 4 प्रतिशत से अधिक दर से धनराशि ITC के रूप देय होगी।
7. ITCतभी देय होगा जबकि UPTT के अन्र्तगत कर लग चुका होगा।
 
B वैट एक्ट लागू होने के बाद यदि कोई व्यापारी कर योग्य होता है तो उस तिथि जिस दिन करयोग्य होता है को स्टाक पर प्ज्ब् देय होगा जिसकी शर्त निम्न प्रकार हैं
1.करयोग्य माल स्टाक उसी दशा में हो।
2.करयोग्य माल का सेमीफिनिस्ड/फिनिस्ड माल/पैकिंग में प्रयुक्त हुआ हो स्टाक में हो।
3. सेल इनवायस हो जिसमें क्रेता व्यापारी का नाम व पता अकिंत हो।
4. ऐसे स्टाक को प्रान्त के भीतर कन्द्रीय व निर्यात के दौरान बिक्री की गयी हो तो 100 प्रतिशत ITC देय है।
5.यदि स्टाक ट्रांसफर/कन्साइनमेन्ट किया गया है तो 4 प्रतिशत से अधिक है, ITCदेय होगा।
 
समाधान योजना अपनाने वाले व्यापारी को योजना के अन्तिम दिन के क्लोजिंग स्टाक पर ITC देय होगा
VAT Act  धारा 6 में यदि व्यक्ति/व्यापारी समाधान योजना अपनाता है तो योजना समाप्ति के अन्तिम दिन के अन्तिम स्टाक पर भी ITC देय होगा। यह ITC जो स्टाक होगा निम्न परिस्थिति में निस्तारण करने पर देय होगा
1.माल को उसी दशा में प्रान्त के भीतर/केन्द्रीय/निर्यात के दौरान बिक्री करें।
2. यदि स्टाक फिनिस्ड/सेमी फिनिस्ड/पैकिंग में प्रयोग किया गया है तो ऐसे माल की प्रान्त के भीतर केन्द्रीय/निर्यात के दौरान बिक्री करने पर।
3.माल का टैक्स इनवाइस/सेल इनवायस हो जिसमें क्रेता नाम/पता अंकित हो।
उत्तर प्रदेश में वैट की आवश्यकता क्यों?
1. उत्तर प्रदेश को छोड़कर पूरे भारत वर्ष में लागू हो गया है.उत्तर प्रदेश के अलावा सभी राज्यों में वैट लागू हो गया है जिसके कारण उत्तर प्रदेश अलगथलग पड़ गया है।
2. अनर्तराष्ट्रीय स्पर्धा में उत्तर प्रदेश पिछड़ा रहा है.वैट राज्यों में निर्मित माल उत्तर प्रदेश से सस्ता पड़ता है इसलिए व्यापार प्रभावित हो रहा है।
3. कर निर्यात को समाप्त करने के लिए.उत्तर प्रदेश उपभोक्ता राज्य होने के कारण दूसरे प्रान्त में निर्मित माल प्रान्त के भीतर अधिक मात्रा में आता है जिसकी खरीद पर प्रत्येक व्यापारी कर दे करके माल का आयात करते हैंं। जिससे राज्य से भारी मात्रा में कर दूसरे राज्यों को चला जाता है। वैट लागू होने पर कर निर्यात में कमी/समाप्त हो जायेगा।

4. कैसकेडिंग (कर पर कर) प्रभाव को समाप्त करना.एकपदीय कर व्यवस्था में कर को वस्तु के उत्पादन मूल्य में जोड़ दिया जाता है और खरीद पर दियें गये कर का कोई लाभ बिक्री पर देय कर में नहीं मिलता है। इस प्रकार कर पर कर उत्पादन की प्रत्येक स्टेज पर लगता है जिसे कैसकेडिंग प्रभाव कहते हैं। वैट में खरीद पर दिये गये कर में से कम कर दिया जाता है और अलग से चार्ज किया जाता है, इससे कर पर (कासकेडिंग) प्रभाव समाप्त हो जाता है।
5. उद्योग व्यापार के पलायन को रोकने हेतु.चूँकि व्यापार कर में कच्चा माल, प्लान्ट मशीनरी आदि पर अदा किये गये कर का लाभ बिक्री पर देय कर में नही मिलता है जबकि वैट वाले राज्यों में कर का लाभ मिलता जिसके कारण उद्योग व्यापार दूसरे राज्यों में पलायन हो रहा है।
6. अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में स्पर्धा में उत्तर प्रदेश पिछड़ा रहा है.वैट न लागू होने से खरीद पर दिये गये कर का लाभ बिक्री पर देय कर में नही मिलता है जिसके कारण उत्पाद महंगा होता है और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में स्पर्धा करने में कठिनाई होती है।
7. व्यापार में पारदर्शिता लाने के लिए.वैट में बिल/कैशमेमो जारी करना अनिवार्य रहता है और इसी के आधार पर कर की छूट मिलती है इससे व्यापारियों में बिल जारी करने की प्रवृत्ति बढ़ती है और उपभोक्ता कितना कर दे रहा है उसे ज्ञात हो जाता है और व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है।
8. कर की दरें अधिक होना.व्यापार कर में जहाँ पर 15 दरें लागू हैं वहीं पर वैट में केवल कर की 4 दरें होंगी यथा0, 1, 4 और 12.5 व 20 प्रतिशत (नान वैट गुड्स के लिए)
9. सामाजिक तथा भौतिक मूलभूत सुविधा (इनफास्ट्रक्चर) हेतु राजस्व में वृद्धि.उपभोक्ता के बिन्दु पर वस्तु का मूल्य अधिकतम होता है। वैट की वसूली उपभोक्ता के बिन्दु तक होता है। वैट लागू होने पर राजस्व अधिकतम मूल्य पर प्राप्त होता है और राजस्व में लगातार वृद्धि होगी।
10. Vetical integration of manufacturering activity  से लघु उद्योग पर प्रभाव.कर बचाने के लिए बड़े पूजीपतियों या कम्पनी/कार्पोरेशन द्वारा उत्पादन होने वाले कच्चे माल या संघटक, स्पेयर पार्टस, एसेसरीज, पैकिंग मैटेरियल आदि उत्पादन करने लगती है जिससे उन्हें बिना कर अदा किये हुए उपरोक्ता वस्तुएं उपलब्ध होती हैं। छोटी इकाई या पूंजी कम होने के कारण ऐसा नही कर पाती है। परिणामस्वरूप सहायक इकाइयाँ या लघु उद्योग पर बुरा प्रभाव पड़ता है और बन्द की कगार पर पहुँच जाती है।
11. अवमूल्यन का बढावा (मूल्य का स्थानानतरण).एकपदीय कर व्यवस्था में कर का निर्धारण प्रथम खरीद अथवा प्रथम बिक्री पर किया जाता है व्यापारी प्रथम बिक्री/खरीद को कम मूल्य दिखा करकेकम धनराशि पर कर दे करके टैक्स पेड माल का दर्जा हासिल कर लेते हैं। आगे डिस्ट्रीब्यूटर, होल सेलर, रिटेलर के बिन्दु पर मूल्य बढ़ा दिया जाता है। टैक्स पेड होने के कारण आगे की स्टेंज पर कर नही लगता है। इससे कम मूल्य पर राज्य सरकार को कर प्राप्त होता है जबकि उपभोक्ता पूरा मूल्य चुकाता है। इस प्रकार मूल्य का स्थानानतरण करके कम कर देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। अपवंचन की प्रवृत्ति बढ़ती है।
12. अधिक संख्या में विवाद.एकदीपय कर व्यवस्था में manufacturing की परिभाषा, वस्तु का सही वर्गीकरण न होने के कारण भारी संख्या में वाद न्यायालय में लम्बित पड़े हैं। जहां पर व्यापारियों को न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैंं वहीं पर विभाग की बहुत बड़ी धनराशि विवादित होने के कारण वसूली नही होती है। वैट प्रणाली में मैन्यूफैक्चर ट्रेडर्स को बराबर रखा गया है। सैटिलमेन्ट कमीशन लागू करके विवादों को निपटारा करने से व्यापारियों को राहत व विभाग को सही कर समय से मिलेगा।
13. इकाइयों को कर मुक्ति.जिन इकाइयों को छूट दे दी जाती है उसका उत्पाद सस्ता होता है उसी प्रकार दूसरी इकाइयों का उत्पाद महंगा होता है। परिणामस्वरूप एक ही वस्तु के व्यापार में असमानता हो जाती है। इससे करापवंचन को बढावा मिलता है। वैट लागू करने से इकाइयों को छूट समाप्त हो जायेगा जिससे यह स्थिति समाप्त हो जायेगी।
14. व्यापार को टैक्स स्ट्रक्चर से मुक्त करने के लिए.व्यापारिक गतिविधियाँ कर नीति पर आश्रित होती है। वैट लागू होने से पूरे भारत वर्ष में एक ही नीति होने के कारण व्यापार कर नीति (टैक्स स्ट्रक्चरर्स) से मुक्त रहेगा और कार्यालयों का चक्कर नही लगाना पड़ेगा और न अलग से छूट की मांग की जायेगी।
15. खपत करने वाले राज्य को कर संग्रह का अधिकार Origin से Consumption की ओर).एकपदीय कर व्यवस्था में कर संग्रह उस राज्य द्वारा किया जाता है जिसमें कर भी शामिल रहता है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि उपभोक्ता द्वारा दिया गया कर का उपभोग उपभोक्ता राज्य द्वारा मूलभूत सुविधाओं हेतु किया जाय। यह तभी सम्भव है जब वैट लगाया जाय अर्थात् Origin सेConsumptionकी ओर कर।
16. टैक्स नेअ की वृद्धि हेतु.वैट में कर का भार कई व्यापारियों पर होगा जिससे यदि एक स्थान पर कर नही मिलेगा तो भी अधिकांश कर वसूली आसानी हो जायेगी। इस प्रकार कर देने वाले व्यापारियों की वृद्धि होगी।
17. अविश्वास की समाप्ति के लिए.कर मुकित् को प्रमाणित करने के लिए सर्टिफिकेट/प्रमाण पत्र को देने की प्रक्रिया लागू है वैट में व्यापारी द्वारा जारी किया गया बिल/टैक्स इनवाइस में चार्ज किया गया टैक्स जमा का प्रमाण माना जायेगा और कर मुक्ति का प्रमाण/फार्म समाप्त हो जायेगी अर्थात् व्यापारी पर पूर्ण विश्वास। अविश्वास का समय समाप्ति की ओर।
वैट से लाभ
1. एक्सपोर्ट जीरोरेटेड zerorated  अर्थात् कर शून्यित होगी जिससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कम्पटीशन करने में आसानी होगी।
2. अन्तर्राज्यीय बिक्री कर शून्यता zerorated होगी तथा टैक्स निर्यात समाप्त।
3. कान्सकेडिंग प्रभाव (कर पर कर लगाने की प्रणाली) समाप्त हो जायेगी।
4. किसी इकाई को अलग से छूट या बढ़ावा (इन्सेन्टिव) देने की आवश्यकता नही रह जायेगी।
5. कर की दर की संख्या चार हो जायेगी आम आदमी को भी कर की दर की जानकारी रहेगी वह माल खरीद करते समय कर सही लिया जा रहा है या नही इसकी जांच सवयं लेगा इससे पारदर्शिता बढेगी।
6. एक फार्म 31 को छोड करके शेष सभी फार्म समाप्त हो जायेगे जिससे व्यापारी को कार्यालय आनेजाने से मुक्ति मिल जायेगी। कर मुक्ति के लिए फार्म की आवश्यकता समाप्त हो जायेगी।
7. 100 प्रतिशत कर निर्धारण वादों का निस्तारण स्वत: हो जायेगा, व्यापारी जो नक्शा देगा वही आदेश माना जायेगा, बारबार कार्यालय लेखा बही ले जाने के झंझट से मुक्ति।
8. साल के अन्त में जो स्टाक अवशेष रहेगा उस पर दिया या कर वपस ही जायेगा जिससे कर में लगी पूंजी व्यापारी के पास रहेगी न कि सरकार के पास इससे व्यापार करने के लिए अधिक पूँजी उपलब्ध होगी।
9. पंजीयन की सीमा बढ़ाकर पांच लाख की जा रही है जिससे छोटे व्यापारी को कोई कर नही देना पड़ेगा और न ही पंजीयन कराने की आवश्यकता रहेगी।
10.बड़े विवादों को निपटाने के लिए निपटारा आयेगा (सेटिलमेंन्ट कमीशन) का गठन। अपील तथा लम्बे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी से छुट्टी।
11.कैपिटल गुड्स पर दिया गया पूरा कर को देय बिक्रीकर में समायोजन या वापसी इससे उद्योग लगाना आसान।
12.ऐसे व्यापारी जो केवल प्रान्त के भीतर का माल खरीदते और प्रान्त में ही बेचते हैं ऐसे छोटे व्यापारियों के लिए समाधान योजना।
13.निर्माता व्यापारी के लिए प्रयोग होने वाले कैपिटल गुड्स तथा कर योग्य माल की खरीद पर दिये गये कर का समायोजन या वापसी।
14.वैट उत्पादन/वितरण की प्रत्येक स्टेज पर कर लगता है इसलिए अण्डरबिलिंग समाप्त हो जायेगी।
15.खरीद पर दिये गये कर का लाभ बिक्री पर देय कर में लेने के लिए बिल की आवश्यकता होगी इसलिए व्यापार जगत में बिल लेने व देने अनिवार्य प्रथा स्वयं लागू होगी तथा बिना बिल के माल खरीदने/बेचने की प्रथा पर स्वयं अंकुश लगेगा इससे अर्थव्यवस्थ में स्थायी सुधार होगा।
16. Origin पर आधारित व्यवस्था से खपत पर आधारित कर व्यवस्था स्थापित होगी।
17.पूरा भारत एक समेकित बाजार (इन्टीग्रेटेड मार्केट) के रूप में विकसित होगा जिससे समग्र विकास होगा।
इस अध्यादेश के प्रारम्भ का दिनांक 01/01/2008 है।
वापसी और समायोजन.1. इस अध्यादेश के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए कर निर्धारक प्राधिकारी द्वारा व्यवहारी को इस अध्यादेश के अधीन उससे देय धनराशि से अधिक भुगतान की गयी कर, फीस या अन्य देयों की धनराशि विहित रीति से वापस की जायेगी :
प्रतिबन्ध यह है कि वापस करने योग्य पायी गयी धनराशि प्रथमत: इस अध्यादेश के अधीन या केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 या पूर्व कर अधिनियम के अधीन व्यवहारी के विरूद्ध अवशिष्ट कर या किसी अन्य धनराशि के प्रति समायोजित की जायेगी और केवल शेष धनराशि, यदि कोई हो, वापस की जायेगी।
अग्रतर प्रतिबन्ध यह है कि इनपुट टैक्स क्रेडिट की आधिक्य धनराशि की, अन्य शर्तों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, वापसी धारा 15 की शर्तों और निर्बंधनों के अध्यधीन होगी।
अपील.1. धारा 48 की उपधारा (7) में उल्लिखित किसी आदेश से भिन्न कर निर्धारक प्राधिकारी द्वारा दिये गय किसी आदेश द्वारा व्यथित कोई व्यवहारी या अन्य व्यक्ति, आदेश की प्रति तालीम किये जाने के दिनांक से 30 दिन के भीतर


अपील मेमो की प्रति कर निर्धारक प्राधिकाराी या कमिश्नर को तामील कराने के पश्चात्, ऐसे प्राधिकारी (जिसे आगे अपील प्राधिकारी कहा गया है), जैसा निर्धारित किया जाये, को अपील कर सकता है :
प्रतिबन्ध यह है कि जहाँ किसी कारणवश, कोई अपीलार्थी अपील दायर करने से पहले कर निर्धारक प्राधिकारी पर अपील मेमों की प्रति तामील करने मे विफल रहता है, वहाँ पर अपील दायर करने के दिनांक से एक सप्ताह के भीतर या ऐसे अग्रतर समय के भीतर जैसा अपील प्राधिकारी अनुज्ञा प्रदान करके ऐसी अपील मेमो की प्रति तामील कर सकता है।
(2) जहाँ उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी आदेश के विरूद्ध कोई अपील दाखिल की गई हो, वहाँ कमिश्नर आवेदन पत्र में यथाउल्लिखित ऐसे बिन्दु पर ऐसे आदेश की वैधानिकता और उसके औचित्य का परीक्षण करने के लिए अपील प्राधिकारी को आवेदन कर सकता है ऐसे आवेदन की एक प्रति अपीलार्थी को तामील की जायेगी और अपीलार्थी द्वारा दाखिल की गई अपील के साथ उस पर विनिश्चय किया जायेगा :
प्रतिबन्ध यह है कि अपील के निपटारे के बाद वैधानिकता के औचित्य के परीक्षण के लिए कोई आवेदन ग्रहण नही किया जायेगा।
यदि आपके यहाँ शोध का कार्य होता है तो आपकी उपब्धियाँ/प्रशिक्षण देने का कार्य होता है तो आप किस प्रकार का प्रशिक्षण देते हैं।
इस विभाग में संग्रह होता है उत्तरप्रदेश में यह विभाग ऐसा है जो कि अकेले 62 प्रतिशत संग्रहण करता है। उक्त संग्रहण राशि से योजनाये जो कि सरकार द्वारा चलित है उनको उक्त संग्रह राशि से पूर्ण किया जाता है।
जनमानस से सम्बन्धित योजनाओं का सम्पूर्ण विवरण, योजनाओं के लिए आवेदन पत्रों के प्रारूप, शुल्क विवरण, अहर्ता
जन सामान्य से सम्बन्धित योजनाओं को उक्त संग्रहण राशि से पूर्ण कर योजनाओं को सफल बनाया जाता है। इस विभाग में ऐसी विकास सम्बन्धी योजना नही है केवल संग्रहण ही जमा होता है।
जनसामान्य के लिए उपयोगी निर्देशों/शासनादेशों का विवरण
शासन से विभाग में तब भी कोई विभाग के लिए, पंजीकृत व्यापारियों के लिए शासनादेश/नियम लागू होते हैं तो लाभान्वित होने वाले व्यापारियों को उक्त से समयसमय पर अवगत करा दिया जाता है।



प्रमाण पत्र
प्रमाणित किया जाता है कि अधोहस्ताक्षिरित द्वारा उपलब्ध करायी गई जानकारी विभागीय रिकार्ड के अनुसार त्रुटिरहित हैं 1 सी0डी0 में दी गई सूचना को जनपद की वेबसाईट पर प्रकाशित करा दिया जाये?
दिनांक


कार्यालय अध्यक्ष का नाम
(मोहर सहीत)
 

 

दावात्याग:(Disclaimer) एन0आई0सी0 मुजफ्फरनगर इस वेबपृष्ठ पर प्रकाशित गलती के लिये जिम्मेदार नहीं है । इस वेबपृष्ठ पर दी गयी सामग्री एवं तथ्‍यों का उपयोग विधिक उददेश्‍य हेतु नहीं किया जा सकता।अधिक जानकारी के लिये सम्बन्धित विभाग से सम्पर्क करें ।

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