प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग मुजफ्फरनगर
 
कार्यालय                                                 सामाजिक वानिकी प्रभाग,   मुजफ्फरनगर एक दृष्टि
विभाग अध्यक्ष का पदनाम                 प्रभागीय निदेशक
पता                                                       सामाजिक वानिकी प्रभाग   मुजफ्फरनगर (विकास भवन के पीछे)
दूरभाष 01312621740
फैक्स 01312621740
Email -    dfomuzaffarnagar @ yahoo.com  
जनसूचना अधिकारी का नाम                                               प्रभागीय निदेशक
पता                                                                                           प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग   मुजफ्फरनगर
दूरभाष 01312621740
सहायक जनसूचना अधिकारी का नाम                                     उप प्रभागीय वनाधिकारी,   मुजफ्फरनगर
                                                                                                         उप प्रभागीय वनाधिकारी, शामली
दूरभाष0131 2621740
अपीलीय अधिकारी का नाम                                            वन संरक्षक, सहारनपुर वृत्त
पता                                                                                        वन संरक्षक /क्षेत्रीय निदेशक
                                                                                                सहारनपुर वृत्त सहारनपुर
दूरभाष01322765801
फैक्स 01322765801

सामाजिक वानिकी कार्यक्रम पर एक दृष्टि:
मेरठ क्षेत्र में सामाजिक वानिकी कार्यक्रम वर्ष 1945 में लैण्ड मेैनेजमेन्ट सर्किल की स्थापना के बाद से ही किसी न किसी रूप में जारी था। उस समय मेरठ क्षेत्र के पॉंचो जनपद सहारनपुर,   मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलन्दशहर व गाजियाबाद उत्तरी दोआब वन प्रभाग, जिसका मुख्यालय मेरठ में था, के अन्तर्गत आते थे। वर्ष 1979 में विश्व बैंक पोषित सामाजिक वानिकी परियोजना लागू होने से पूर्व प्राय: जमीदारी प्रथा समाप्त होने के पश्चात् वन वभाग में विलय हुए वन खण्डों का मेनेजमेन्ट करने तथा सडक व नहर की पटरियों पर वृक्षारोपण करने पर ही बल दिया जाता था । उत्तर प्रदेश के मैदानी जनपदों के ग्रामीणों की बढ़ती हुई ईंधन चारा पत्ती, इमारती लकड़ी की पूर्ति करने हेतु तथा भूमिहीनों के लिए रोजगार के नये अवसर जुटाने के उद्देश्य से वर्ष 1979 में विश्व बैंक की मदद से सामाजिक वानिकी परियोजना लागू की गई। सामाजिक वानिकी के प्रथम चरण (1979से 1984) में सड़क पटरी, रेल पटरी, नहर पटरी, सामुदायिक भूमि तथा परती,ऊसर,अनुपयोगी (अवनत) वन भूमि पर वृक्षारोपण करने पर विशेष जोेर दिया गया। ग्रामीणों को रियायती दर पर इं‍र्धन, चारा व लकड़ी देने वाली पौध उपलब्ध कराने हेतु प्रभागों मे अनेक विभागीय नर्सरियॉं स्थापित की गयी । इसी क्रम में शासनादेश सं0 12328/ 14180606 /1980 दिनांक 20.1.1981 के द्वारा सामाजिक वानिकी प्रभाग का सृजन किया गया।

सामाजिक वानिकी प्रभाग,   मुजफ्फरनगर का संक्षिप्त विवरण

जनपद   मुजफ्फरनगर 770 6श् से 780 12श् पूर्वी देशान्तर एवं 290 43श् से 300 27श् उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित है। जनपद का भौगोलिक क्षेत्रफल 4048.8 वर्ग कि0मी0 है तथा वनों का क्षेत्रफल, भौगोलिक क्षेत्र (आरक्षित, संरक्षित, धारा4,निहित वन क्षेत्र ) का मात्र 3.310 प्रतिशत है। इस प्रभाग के अन्तर्गत छ: रेंज क्रमश:   मुजफ्फरनगर, जानसठ,मोरना, बुढाना, कैराना व ऊन कार्यरत है। इस प्रभाग में वनों का क्षेत्रफल श्रेणीवार निम्न प्रकार है:
(1)निहित वनों का क्षेत्रफल 17257.98 हेक्टेयर
धारा4 के अन्तर्गत विज्ञापित वन क्षेत्रफल10538.01 हेक्टेयर
तथा धारा20 के अन्तर्गत विज्ञापित वनों का क्षेत्रफल3175.616 हेक्टेयर
(2)इस प्रभाग में अधिकतर आरक्षित क्षेत्र मोरना एवं जानसठ रेंज में पड़ता है जो हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के अन्तर्गत है। मुख्य रूप से पूर्वी यमुना नहर, मुख्य गंगा नहर, अनूपशहर ब्रांच एवं मध्य गंगा नहर की, नहर पटरियां संरक्षित वन के रूप में घोषित हैं । इन नहर की पटरियों पर विभिन्न प्रजातियों यथा शीशम, आम, जामुन, खैर एवं यूकेलिप्टस के मिश्रित वन हैं जिनका क्षेत्रफल 731.30 हेक्टेयर है।
(3)इस वन प्रभाग के अन्तर्गत आने वाली सडकों (राष्ट्रीय मार्ग, राज्य मार्ग एवं जिला एवं अन्य मार्गो के दोनों ओर की पटरियों पर विभिन्न प्रजातियों यथाशीशम,आम,यूकेलिप्टस आदि के मिश्रित वन है। सडकों की कुल लम्बाई 920 किलोमीटर है।
(4)सीमा विवरण:
उत्तर दिशा जनपद हरिद्वार एवं सहारनपुर
पूर्व दिशाजनपद बिजनौर
दक्षिण जनपद मेरठ
पश्चिम राज्य हरियाणा
(5 )जलवायु एवं तापमान
  मुजफ्फरनगर जनपद में माह मई,जून में अधिकतम औसत तापमान 42.4 डिग्री से0 न्यूनतम तामान 24.2 डिग्री से0 तथा दिसम्बर में औसत तापमान 22 डिग्री से0 तथा न्यूनतम 4 डिग्री से0 होता है।


::हस्तिनापुर वन्य जीव अभ्यारण्य ::
हस्तिनापुर वन्य जीव विहार का गठन शासनादेश सं0 3782/1435784 दिनांक 30.7.1986 के द्वारा किया गया था । उस समय 2073 वर्ग कि0मी0 क्षेत्र हस्तिनापुर अभ्यारण्य में सम्मिलत किया गया था जनपद   मुजफ्फरनगर में 25.99 वर्ग कि0मी0 क्षेत्र हस्तिनापुर अभ्यारण्य में सम्मिलित किया गया था कालान्तर में वनादेश संख्या 4301/14497852/97 दिनांक 13.11.1997 द्वारा कृषकों की निजी भूमि को छोडकर समस्त सरकारी जलमग्न बंंजर भूमि आदि को हस्तिनापुर अभ्यारण्य में सम्मिलित करने के आदेश दिये गये जिसके अनुसार निम्नानुसार 101.81 वर्ग कि0मी0 क्षेत्र वन्य जीव संरक्षण अधिनियम1972 की धारा 26 के लिए प्रस्तावित है।
क उत्तर :ग्राम बेलडा (   मुजफ्फरनगर ) से गंगा नदी तक कच्चा किन्तु
स्थायी मार्ग होकर बिजनौर जिले में कच्चा मार्ग होकर गंगा नदी
सुमेरा कलां तक सुमेरा कलां से पक्का मोटर मार्ग होकर मण्डावर
तक।
ख पूर्व: बिजनौर जिले की सीमा तक
ग दक्षिण:जनपद मेरठ की सीमा तक
घ पश्चिम:मीरापुर शाखा नहर के साथसाथ रामराज से ककरौली तक
तथा ककरौली से पक्की सडक द्वारा मोरना और मोरना से बेलडा
और रजवा तक
इस अभ्यारण्य के अन्तर्गत मुजफनरगर जनपद में आने वाली भूमि का विवरण निम्न प्रकार है:
1. जलमग्न भूमि 22.11 वर्ग कि0मी0
2. अन्य ग्राम समाज की भूमि 18.34 वर्ग कि0मी0
3. राजकीय भूमि
(क) आरक्षित वन भूमि 28.44 वर्ग कि0मी0
(ख) धारा4 व निहित भूमि 29.77 वर्ग कि0मी0 (अमलदरामद)
(ग) सिचाई विभाग की भूमि 3.15 वर्ग कि0मी0
योग 101.81 वर्ग कि0मी0

4. संरक्षित वन
(क) स्टेट हाईवे12मोरना से जनपद बिजनोैर की सीमा तक दोनों पटरियां
(ख) स्टेट हाईवे47रामराजककरौली रजवाहेे से जनपद बिजनौर जनपद की सीमा तक दोनों पटरियां
5. मध्य गंगा नहर मध्य गंगा नहर की बिजनौर बैराज से मेरठ की सीमा तक दोनों पटरियां

वन अनुसंधान संस्थान, उ0 प्र0 विहंगम दृष्टि
संक्षिप्त इतिहास
उत्तर प्रदेश में वन अनुसंधान का कार्य वर्ष 1918 में राज्य वन वर्धनिक के रूप में श्री स्मिथीज, भा0 व0 से0 की तैनाती के साथ प्रारम्भ हुआ। कालान्तर में वन अनुसंधान की गतिविधियों में विस्तार की प्रक्रिया में दो और वन वर्धनिकों की तैनाती की गई। वन क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि की महती आवश्यकता को अनुभव किया गया व इस दिशा में सघन कार्य हेतु वर्ष 1970 में कानपुर में राज्य वन अनुसंधान प्रयोगशाला स्थापित की गई जिसकों वर्ष 1993 में वन अनुसंधान संस्थान, उ0 प्र0, के रूप में उच्चीकृत किया गया ।
स्थिति
अक्षॉश 260 29 से 20.56 तक उत्तर
देशान्तर800 17 से 24.45तक पूर्व
समुद्र तल से उॅचाई152 मीटर
समीपस्थ हवाई अडडा चकेरी ;कानपुरद्ध दूरी 20 किमी. एवं अमौसी ;लखनऊद्ध दूरी लगभग 80 किमी.
रेलवे स्टेशनकानपुर सेन्ट्रल ;दूरी लगभग 11किमी.द्ध
उत्क्रम क्षेत्र
प्रदेश में वन अनुसंधान के प्रमुख उत्क्रम क्षेत्र निम्न है:
वृक्ष सुधार कार्यक्रम के माध्यम से वनों की उत्पादकता में वृद्धि ।
मदर वृक्षो से प्राप्त उच्च गुणवत्ता के बीज की आपूर्ति ।
वृक्षारोपण की दृष्टि से समस्याग्रस्त क्षेत्रों हेतु उपयुक्त रोपण तकनीकों का विकास।
औषधीय पौधों का उनके प्राकृतिक क्षेत्रों के भीतर एवं अन्यत्र संरक्षण।
उपयुक्त कृषि वानिकी माडलों का विकास ।
पारिस्थितिकी एवं प्रदूषण संबंधी अध्ययन ।
प्रशिक्षण, तकनीकी बुलेटिनों व प्रयोगशाला से भूमि तक पत्रकों के प्रकाशन के माध्यम से परिणामों का विकीर्णन।
प्रदेश की भौगोलिक स्थिति के कारण वानिकी कार्यों में अनेक प्रकार की तकनीकी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, जैसे ऊसर, बीहड़, खारे पानी के क्षेत्र, टेनरी के रसायनों, प्रदूषित जल, तराई क्षेत्र की खादरखोला भूमि, पर्वतीय क्षेत्रों की अवनत भूमि, ईंधन एवं चारा पत्ती तथा औद्योगिक प्रजातियों के रोपण आदि। उक्त वर्णित समस्याओं के निदान हेतु वानिकी से संबंधित अनुसंधान कार्यों को प्रारम्भ किया गया, जिससे उन समस्याओं का निराकरण कर भौेगोलिक स्थिति के अनुसार प्रजातियों का चयन कर उपयुक्त स्थानों पर रोपित किया गया जिससे वनों के क्षेत्र को बढ़ाने में काफी सफलता प्राप्त हुई है। प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव शहरी क्षेत्रों में भी पड़ा है जिससे शहरी क्षेत्रों में पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई है, जिसे दूर करने हेतु विभाग द्वारा शहरी क्षेत्रों की सुन्दरता को बढ़ाने तथा प्रदूषण को कम करने हेतु विभिन्न प्रकार की उपयुक्त प्रजातियों का रोपण किया गया है।
वानिकी कार्यों को बढ़ाने में अनुसंधान का विशेष महत्व है। अनुसंधान द्वारा वानिकी कार्यों में उत्पन्न हो रही तकनीकी समस्याओं का निराकरण करने के साथसाथ समय समय पर नई तकनीकी जानकारी भी उपलब्ध करायी गई है। वर्तमान में अनुसंधान द्वारा क्लोनल तकनीक से पौधे तैयार करने का कार्य सफलतापूर्वक किया जा रहा है। विभाग की विभिन्न

पौधशालाओं में थैली के स्थान पर रूट ट्रेनर पर पौध उगाने का कार्य सफलतापूर्वक किया जा रहा है। उक्त कार्यों के अतिरिक्त विभिन्न प्रजातियों पर भी अनेकों शोध कार्य किए जा रहे हैं।
वन अनुसंधान द्वारा विभिन्न प्रजातियों के उच्चकोटि के बीजों का एकत्रीकरण कार्य भी किया जाता है तथा एकत्रित बीजों को परीक्षण के उपरान्त वन प्रभागों को आपूर्ति किया जाता है। उच्च गुणवत्ता एवं अनुवांशिकी की बीज आपूर्ति हेतु पूरे उत्तर प्रदेश में भिन्न प्रजातियों को धनात्मक वृक्ष/बीज वृक्ष, बीज उत्पादन क्षेत्र, बिजौला बीज उत्पादन क्षेत्र तथा क्लोनल बीज उद्यानों की स्थापना की गई है। इस प्रकार वानिकी कार्यों को बढ़ाने में अनुसंधान का विशेष योगदान है।


जनपद में वन विभाग का संगठन, कार्य व कर्तव्य
वन विभाग का संगठन व पृष्ठभूमि
सन् 1861 में वन विभाग के संगठन का श्रीगणेश हुआ। उत्तर प्रदेश में सन् 1868 में सर्वप्रथम वन विभाग की स्थापना हुई। जिसके प्रधान एक अरण्यपाल नियुक्त किये गये, परन्तु उत्तर प्रदेश में अन्य स्थानों की अपेक्षा वन सम्पदा के निर्माण तथा सम्वद्र्धन का कार्य कठिन था । सबसे पहले कार्यकत्त‍रओं को सर्वेक्षण करना पड़ा और मार्ग विहीन, दुर्गम, निर्जन एवं वन जन्तुओं से पूर्ण वनों के विस्तृत क्षेत्रों की जॉच, व्याख्या एवं सीमाकंन आदि करना पड़ा । वनों को अग्निदाह और अन्य क्षति से बचाने के लिये ऐसा करना आवश्यक था, ताकि मूल्यवान वृक्षों की गणना करके समुपयोजन की व्यवस्था की जा सके, तथा न्याय व माल विभाग के अधिकारियों के सहयोग से वनों में आसपास की जनता के अधिकार को पूर्ण रुप से लेखबद्ध किया जा सके। सबसे कठिन एवं आवश्यक कार्य था अनेक पीढि़यों से प्रचलित कुप्रथाओं और कुरीतियों को मिटाना। अनियंत्रित चराई, शाख तराशी, अवैध कटान, द्वेष से आग लगाना शीघ्र धनी बनने की लालसा रखने वाले ठेकेदारों का स्वार्थ तथा इसी प्रकार के अन्य कुकृत्यों से राज्य के वन लगभग आधी बर्बादी की दशा को पहॅुच चुके थे। अत:अनेक वर्षो तक वन विभाग समुपयोजन (म्गचसवपजंजपवदद्ध की अपेक्षा संरक्षण (ब्वदेमतअंजपवदद्ध के कार्य ही में लगा रहा। एक प्रकार से उपरोक्त संरक्षण नीति ही वन प्रशासन की आधार शिला है।


भारतीय सविधान के भाग:4 ,अनुच्छेद 48 क राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अन्तर्गत् राज्य देश के पर्यावरण संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा। वर्ष 1976 में 42 वें संशोधन में भाग 4 क के रुप में जोडे़ गए संशोधन में अनुच्छेद 51 क खण्ड घ में देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य निर्धारित किया गया कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव है की रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे। भारतीय संविधान के 42 वें संशोधन के उपरान्त वन समवर्ती सूची (ब्वदबनततमदज सपेज) में आ गया। केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 1980 में पारित वन संरक्षण आधिनियम 1980 के अनुसार वन भूमि को वनेत्तर प्रयोग में लाने के लिए केन्द्र सरकार की पूर्वानुमति अनिवार्य हो गई। यह सभी महत्वपूर्ण घटनायें राष्ट्रीय स्तर पर वनों के प्रबन्ध की आवश्यकता को प्रकट करती है। इन्ही घटनाओं के अनुरुप चिन्तन की पुष्टि करते हुए, माननीय उच्चतम न्यायालय के रिट पिटीशन गोडावर्मन थिरुमल्कपाद बनाम भारत सरकार एवं अन्य के अंतरिम निर्णय दिनांक 12.12.1996 में यह निर्देश दिये गये है कि विभिन्न राज्यों के वनों का विकास और विदोहन कार्य योजना में दिये गये निर्देशों के अनुरुप किया जायेगा तथा सभी कार्ययोजनायें भारत सरकार द्वारा अनुमोदित होनी चाहिये। विभाग का प्रसार अनिवार्य था और कई नये प्रभाग स्थापित किये गये। इस अवधि में वनों के विधिप्रशासन के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण कार्य यह हुआ कि बागों बंजर भूमि और निजी वनों के कटानों को नियंत्रित करने के लिए निजी वन अधिनियम (प्राईवेटफारेस्ट एक्ट) पारित किया गया तथा सरकार में विहित निजी वनों में अनियमित वृक्ष कटान नियंत्रण में लाने के लिए इंडियन फारेस्ट ऐक्ट में भी संशोधन किये गये एवम् वन्य जीव संरक्षण के लिए वर्ष 1972 में वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 अस्तित्व में आया। पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन हेतु व्यक्तिगत व सार्वजनिक भूमि (गैर वन भूमि) में वृक्ष पातन को नियंत्रित करने हेतु 1976 में प्रदेश में उत्तर प्रदेश ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्र में वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 (उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 45, 1976) अस्तित्व में आया। प्रदेश में उत्तर प्रदेश इमारती लकड़ी व अन्य वन उपज अभिवहन नियमावली 1978 लागू हुई। नेशनल कमीशन आन एग्रीकल्चर (1973 तथा 76 ) की प्रबल संस्तुतियों ने सामाजिक वानिकी कार्यक्रम में एक प्रमुख भूमिका अदा की । विश्व बैंक पोषित सामाजिक वानिकी परियोजना 1979 में उत्तर प्रदेश में प्रारम्भ हुई। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण जनता की ईधन, चारा, लघु प्रकाष्ठ, गैर प्रकाष्ठ, वनोपज आदि की मांग की पूर्ति करना तथा ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के साधन उपलब्ध कराकर उनको गरीबी रेखा से ऊपर उठाना रहा।


सामाजिक वानिकी प्रभाग का कार्य लक्ष्य
जनता हेतु जन केन्द्रित प्रणाली से पारिस्थितिकी तन्त्र को संरक्षित करना तथा प्राकृतिक वनों की सुरक्षा, विकास एवं प्रबन्धन करते हुए वृक्षारोपण के माध्यम से वनावरण वृद्धि का प्रयास करना।
वन विभाग की प्राथमिकताएं
1 पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखना तथा पर्यावरण संरक्षण।
2 जैव विविधता संरक्षण।
3 प्रदूषण के कुप्रभावों को उपयुक्त प्रजातियों के रोपण द्वारा कम करना।
4 ईंधन, चारा तथा लघु प्रकाष्ठ की उपलब्धता में वृद्धि का प्रयास करना।
5 फार्म वानिकी एवं कृषि वानिकी को बढ़ावा देना।
6 वन प्रबन्ध के माध्यम से वानिकी कार्यो में जनता की सहभागिता सुनिश्चित करना।
7 पौधों की उन्नत किस्में विकसित करके तथा उन्नत बीजों के अधिकाधिक प्रयोग से वनों की
उत्पादकता में वृद्धि करना।
8 वनों/वनाच्छादित क्षेत्रों में वृद्धि करना।
10 अभिरुचि के विषयों में प्रशिक्षित कर स्टाफ की कार्यकुशलता बढ़ाना।
11 वन एव वन्य जीव अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण करना।
13 वनीकरण को जन आन्दोलन का रूप देना।


वन क्षेत्र में वृद्धि के लिए जनपद   मुजफ्फरनगर में निर्धारित रणनीति
जनपद में भौगोलिक क्षेत्र का एक तिहाई भाग वनों से आच्छादित रहे एवं वनाच्छादित क्षेत्र को अधिकाधिक बढ़ाने के लिए विभाग द्वारा निम्नानुसार रणनीति प्रस्तावित है:
1. राजकीय विभागों एवं विकास प्राधिकरणों द्वारा वृक्षारोपण करवाना ।
2. जनपद में भूमि उपयोग करने वाले समस्त विभागों, जैसे लोक निर्माण, सिंचाई, सहकारिता, कृषि, ग्राम विकास, कैण्टोनमेण्ट तथा अन्य के लिए निर्धारित क्षेत्रफल में वन लगाना अनिवार्य किया जाना।
3. सरकारी एवं निजी क्षेत्र में लगने वाले उद्योगों एवं अन्य परियोजनाओं में भी उनके पास
उपलब्ध भूमि में पेड़ लगवाना ।
4. विकास प्राधिकरणों के द्वारा विकसित की जा रही नई आवासीय कालोनियों में कम से कम एक तिहाई क्षेत्रफल में ग्रीन बेल्ट का निर्धारण कर उस पर पेड़ लगवाना ।
5. ऊसर, बीहड एवं निष्प्रयोज्य खाली भूमि को विकसित कर पेड़ लगाने के लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जाना।
6. शिक्षण संस्थाओं/कृषि विश्वविद्यालयों/विद्यालयों, पाठशालाओं एवं अन्य संस्थानों में जिनके पास बड़ेबडे़ परिसर है, पेड़ लगवना ।
7. कृषकों को वृक्षारोपण करने हेतु प्रोत्साहित करना ।
8. सड़कों, नहरों व रेल मार्गो के किनारे वृक्षारोपण कार्य करवाना।
9. वांछित मात्रा में उपयुक्त प्रजातियों को किसानो को उपलब्ध कराने के लिए नर्सरी(पौधशाला) का संचालन करना।

10. अवैध कटान रोकना
प्रकाष्ठ के मूल्यों में असाधारण वृद्धि के फलस्वरूप वन क्षेत्रों में अवैध कटान को प्रोत्साहन मिला है परन्तु वन अधिनियम को सुदृढ़ करके एवं वन विभाग द्वारा चौकसी बढ़ा कर इस समस्या पर नियंत्रण पाने का प्रयत्न किया गया है।
11. अवैध खनन रोकना
खनिज विभाग, राजस्व विभाग तथा पुलिस के सामंजस्य से इस समस्या पर नियंत्रण किया जा रहा है। इस समस्या का मुख्य कारण मिलजुमला नम्बरों में खनन पट्टे स्वीकृत किया जाना है, जिनके कुछ भाग में वन भी होते हैं। अत: विभाग का विचार है कि मिलजुमला नम्बरों म,ें जिनमें वन भूमि सम्मिलित हो के खनन पट्टे न दिये जायें।
12. अतिक्रमण रोकना
वन भूमि पर अतिक्रमण की समस्या पर अंकुश लगाने में सफलता मिली है। अतिक्रमण खाली करवाने के लिए न्यायालयों के माध्यम से एवं प्रशासनिक उपायों से प्रयत्न किये जा रहे हैं।
13. भूमि हस्तान्तरण
वन भूमि का गैर वानिकी कार्यों के लिए प्रयोग मात्र जनहित के कार्यों जिनसे विकास कार्यों को बल मिलता है तथा स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार का साधन उपलब्ध होता है, के दृष्टिगत प्रस्तावों को अनुमोदन हेतु भारत सरकार को प्रेषित किया जाता है।
वन विकास तथा सम्वद्र्धन की महत्वपूर्ण योजनाएं
1सामाजिक वानिकी
इस योजना का मुख्य उद्देश्य आरक्षित वनों से बाहर के क्षेत्रों में ग्रामीणों को उनके गांवों के समीप ईंधन, चारा पत्ती, अन्य गैर प्रकाष्ठ वन उपज व ग्रामीण एवं लघु काष्ठ उद्योग हेतु कच्चा माल सुलभ कराने हेतु उपयुक्त प्रजातियों का रोपण करना तथा जनता में वृक्षारोपण के प्रति अभिरुचि जागृत करना है। कृषि वानिकी के अन्तर्गत किसानों की निजी भूमि पर रोपण हेतु उच्च गुणवत्ता के पौधे तैयार कर उपलब्ध कराना तथा कृषकों को वृक्षारोपण से मिलने वाली अतिरिक्त आय, वैज्ञानिक भू उपयोग, औषधीय पौधों, वृक्षों के बीच में मिश्रित खेती के विभिन्न माडलों को तैयार कराकर किसानों को अवगत कराना एवं इनका प्रचारप्रसार करना सुनिश्चित किया जा रहा है।
2औद्योगिक एवं पल्पवुड वृक्षारोपण
इस योजना के अन्तर्गत काष्ठ आधारित उद्योगों जैसे माचिस, प्लाईवुड, हार्डबोर्ड, पार्टिकल बोर्ड, पैकिंग केस, कत्था, फर्नीचर आदि की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयुक्त प्रजातियों का रोपण किया जाता है।
3शहरी क्षेत्रों में सामाजिक वानिकी
यह योजना शहरी क्षेत्रों में सड़कों के किनारे खाली पड़ी भूमि, नाले एवं पार्को के समीप की भूमि में शोभाकार वृक्षों का रोपण कर उन्हें वृक्षों से आच्छादित करने एवं शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या के बढ़ते दबाव व औद्योगिक संस्थाओं से होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित कर घनी आबादी वाले शहरों के वातावरण को स्वच्छ एवं उनके सौन्दर्यवर्धन के उद्देश्य से चलायी जा रही है।
4. अन्य महत्वपूर्ण योजनायें
1राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम
वन विकास अभिकरण के माध्यम से प्रदेश के जनपदों में भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित राष्ट्रीय वनीकरण योजना के अन्तर्गत वानिकी कार्यों के साथ स्थानीय विकास, सुरक्षा एवं सम्वद्र्धन कार्य में ग्राम वासियों की सहभागिता प्राप्त की जा रही है।

2वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण जनता के द्वार
योजना के अन्तर्गत प्रत्येक जिला मुख्यालय के शहरी क्षेत्रों में किसी नागरिक द्वारा प्रभागीय वनाधिकारी से लैण्ड लाइन, मोबाइल, एस.एम.एस. अथवा ईमेल द्वारा अपने आवास,परिसर अथवा अन्य भूमि पर वृक्षारोपण करने का अनुरोध करने पर आवेदित स्थल पर निर्धारित शुल्क भुगतान पर वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण किया जाता है। रोपित किए जाने वाले प्रत्येक एक वर्षीय, दो वर्षीय, शोभाकार पौध व अतिविशिष्ट पौध हेतु क्रमश: रु0 15, 20 ,20 एवं 40 देय होगे। रखरखाव, सुरक्षा, सिंचाई आदि की व्यवस्था सम्बन्धित नागरिक द्वारा की जाएगी। इस समय जनपद में यह योजना कार्यरत नही है।


कृषि वानिकी
कृषि वानिकी क्या है ?
कृषि वानिकी का अर्थ है एक ही भूमि पर कृषि फसल एवं वृक्ष प्रजातियों को विधिपूर्वक रोपित कर दोनों प्रकार की उपज लेकर आय बढ़ाना। कृषि वानिकी के अन्तर्गत काष्ठीय बहुवर्षीय प्रजातियां एक ही भूमि पर कृषि फसलों के साथ उगाई जाती हैं। यह पद्धति आर्थिक रूप से लाभप्रद, सामाजिक रूप से स्वीकार्य तथा समस्त भूमि सुधारक प्रक्रियाआें का समेकित नाम है।
कृषि वानिकी क्यों ?
हमारे प्रदेश की अर्थव्यवस्था मुख्यत: कृषि पर आधारित है। प्राकृतिक आपदायथा बाढ़ व सूखा से फसल नष्ट होने पर कृषकों को आर्थिक क्षति पहुँचती है तथा उनकी अर्थ व्यवस्था की रीढ़ टूट जाती है। उत्पादन अ​िाक होने पर मूल्य न्यून हो जाने से कृषक को लागत भी प्राप्त नहीं होती है। कृषि के साथ वृक्ष रोपित करने से उपयुक्त समय व बाजार मूल्य प्राप्त होने पर काटने व बेचने की सुविधा है। इसके साथ ही फसल के साथ रोपित वृक्ष प्राकृतिक आपदा को झेलते हुए कृषक के लिए निवेश व बीमा जैसे लाभकारी सिद्ध होते हुए कृषक की आवश्यकता यथा शादी जैसे पारिवारिक उत्सवोंपर धन उपलब्ध करवाते हैं। कृषि वानिकी को अपनाकर कृषक खेती मेें विविधता लाकर अनाज के साथ ही जलौनी लकड़ी, कृषि औजारों की लकड़ी, पशुआें के लिए चारा आदि निवास के समीप खेतों से प्राप्त कर अपनी आवश्यकताआें की पूर्ति करने के साथ ही अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकते हैं। ईधन के रूप में प्रयुक्त किए जाने वाले गोबर को जलाने से बचा कर खाद के रूप में प्रयुक्त किये जाने से कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ ही रासायनिक उर्वरक में व्यय होने वाली धनराशि की बचत कर सकते हैं।
कृषि वानिकी के विभिन्न प्रकार :
कृषि वानिकी के अन्तर्गत खेत के चारों तरफ मेड़ों पर दो या तीन पंक्तियाें में अथवा खेतों के अन्दर पंक्तियों में एक निश्चित दूरी में फसलों के साथ वृक्षों को रोपित किया जाता है। इस पद्धति मेें रोपित वृक्षों के मध्य दूरी इस प्रकार रखी जाती है कि उनके मध्य में कृषि फसलों को उगाया जा सके तथा कृषि कार्य हेतु उनके मध्य से टै्रक्टर आदि चलाया जा सके। कृषि वानिकी पद्धति को उपलब्ध स्थल एवं स्थानीय आवश्यकता की पूर्ति के अनुसार विभिन्न स्वरूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है :
1. कृषि वानिकी पद्धति
2. कृषि बागवानी पद्धति
3. कृषि बागवानी वानिकी पद्धति
4. पुप्प बागवानी, कृषि एवं वानिकी पद्धति
5. सब्जी वानिकी पद्धति
6. मत्स्य पालन वानिकी पद्धति
7. गृह वाटिका पद्धति
8. चारागाह वानिकी पद्धति।


कृषक भाई आप अपने खेत मेें फसल के साथ वृक्ष प्रजातियों का भी अधिकाधिक रोपण करें क्योंकि इसे अपनाकर आप :
1. खेत का पूरा उपयोग कर अधिकतम व विभिन्न प्रकार के उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं।
2. अन्न का उत्पादन बढ़ा सकते हैं व लगाए गए पेड़ को बेचकर धन प्राप्त कर सकते हैं।
3. खेत में ही चारा, ईंधन, इमारती लकड़ी, कुटीर एवं लद्यु उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त कर सकते हैं।
4. खेत में ही ईंधन प्राप्त कर, गोबर को कंडा बनाकर जलाने से बचाकर खाद के रूप में प्रयोग कर धन की बचत व अधिक फसल प्राप्त कर सकते हैं।
5. वर्तमान में कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त भूमि का सुधार व उसकी उत्पादकता में वृद्धि कर सकते हैं।
6. खेत में लगाए वृक्ष शादी जैसे पारिवारिक उत्सवों पर आवश्यकता पड़ने पर आपको धन उपलब्ध करवा सकते हैं।
7. प्राकृतिक आपदा, यथाबाढ़, सूखा, अधिक वर्षा आदि से कृषि फसल को क्षति पहुँचने पर अथवा कृषि फसल अधिक होने के कारण मूल्य में कमी आने पर अपने खेत के वृक्ष को बेचकर धन अर्जित कर सकते हैं।
8. उपलब्ध प्राकृतिक वनों पर जैविक दबाव कम कर सकते हैं।
9. वृक्षारोपण में वृद्धि कर भूमि एवं जल संरक्षण कर, पर्यावरण में संतुलन स्थापित कर प्रदेश व देश के विकास में अपना योगदान दे सकते हैं।
कृषक भाई :
आप अपने खेतों में अन्न उपजाने के साथसाथ अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर आर्थिक रूप से सृदृढ़ हो सकते हैं। खेत मेें फसल के साथसाथ वृक्ष लगाकर भविष्य की सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
क्या आप जानते हैं कि :
खेती के साथ रोपित वृक्षों में निम्न विशेषतायें होनी चाहिए :
1. शीघ्र बढ़ने वाला :
कृषि वानिकी के अन्तर्गत ऐसे वृक्षों को उगाना चाहिए जो अपेक्षाकृत तेज बढ़ने वाले हो जिससे आप अपने लाभ हेतु उनसे कम समय में ही उपज प्राप्त कर सकें।
2. सीधा तना :
कृषि वानिकी में रोपण हेतु सीधे तने, कम शाखाआें, विरल छत्र व शाख तराशी सहने वाली वृक्ष प्रजातियों को चयन में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
3. गहरी जड़ें :
कृषि वानिकी में लम्बी जड़ों वाले वृक्षों को उगाना बहुत लाभदायक होता है। यह जड़ें भूमि में जाकर नीचे से लाभदायक पदार्थ ऊपर लाती हैं जो कृषि फसलों को फायदा पहुँचाते हैं। वृक्षों की मूसला जड़ों की बढ़त इस प्रकार हो कि वे जल से खनिज लवणों के अवशोषण व फसलों की आवश्यकता के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकें।
4. द्विदलीय बीजीय वृक्ष :
कृषि वानिकी के अन्तर्गत द्विदलीय बीज वाले वृक्ष उगाना अधिक लाभदायक है, क्योंकि ऐसे वृक्ष हवा से नाइट्रोजन लेकर भूमि में जमा करते है, जो कि कृषि फसलों के लिए लाभदायक है।


विभिन्न क्षेत्राें मेें रोपण हेतु उपयुक्त प्रजातियां :
क्षेत्र का नामईंधन प्रजातिचारा पत्तीइमारती लकड़ी (पश्चिमी)बबूल, ढाक, यूकेलिप्टसविलायती बबूल, काला सिरसअरू‍र्, बबूल बकैनबेर, कचनार, नीम,बबूल, बांस,, कंजी, आम, सागौन, शीशम, नीम, जामुन

4. कृषि वानिकी उत्पाद विपणन :
कृषि वानिकी के अन्तर्गत् उगाई गई वृक्ष प्रजातियों का विक्रय स्थानीय अथवा निकटवर्ती विक्रय, केन्द्र में कर सकते हैं। क्षेत्र में स्थापित उद्योगों से सामंजस्य स्थापित कर भी वृक्ष प्रजाति, मात्रा व दर के सम्बन्ध में पूर्व से ही अनुबन्ध किया जा सकता है।


कृषि वानिकी पद्धति
इसके अन्तर्गत कृषि क्षेत्र मेंं प्लाट के चारों तरफ मेड़ों पर दो या तीन पंक्तियों में वृक्षों को 3 मीटर के अन्तराल में रोपित करते हैं। इसके अतिरिक्त खेतों के अन्दर पंक्तियों में एक निश्चित दूरी में भी वृक्षों को रोपित किया जाता है। इस पद्धति में रोपित वृक्षों के मध्य अन्तराल इस प्रकार रखा जाना चाहिए कि उनके मध्य में कृषि फसलाें को उगाया जा सके तथा कृषि कार्य हेतु उनके मध्य से टै्रक्टर आदि चलाया जा सके। इस पद्धति में साधारणत: 5मी ग 4मी. अथवा 5मी. ग 5मी. की दूरी अधिक उपयुक्त होती है। प्रदेश के तराई क्षेत्रों मेें कृषकों द्वारा उक्त प्रकार के वृक्षारोपण हेतु पॉपलर (पा. डेल्टाइडिस) प्रजाति सर्वोत्तम पायी गयी। वन विभाग के अनुसंधान वृत्त द्वारा प्रजाति के अधिक उत्पादकता वाले कुछ क्लोन भी विकसित किये गये हैं जिनको विभिन्न कृषि जलवायु वाले क्षेत्रों में रोपित किया जा सकता है। इस पद्वति में यूकेलिप्टस, सागौन तथा शीशम का रोपण भी क्षेत्र विशेष के अनुसार कृषकों द्वारा अपनाया जा रहा है।

खेत के किनारे पद्धति :
पश्चिमी गांगेय क्षेत्र :
कृषिरबी : गेहूँ, सरसों, चना, गन्ना, मसूर।खरीफ : मक्का, मूँग, उर्द, ज्वार।
वृक्षों की छाया होने परहल्दी, मसूर, अदरख।
काष्ठ प्रजातिपॉपलर, यूकेलिप्टस, सागौन।
चारा व जलौनीसुबबूल, सहजन, विलायती बबूल, बबूल, अगस्त, खैर।
फल प्रजातिआम, आँवला, आडू, नींबू, किन्नू, बेर।

कृषिबागवानी पद्धति
इस पद्धति का सबसे अधिक प्रचलन तराई व दोआब क्षेत्र में है। इस पद्धति को अपनाने के निम्न उद्देश्य है :
1.उत्पादकता में वृद्धि 2. ग्रामीण बच्चाें को कुपोषण से मुक्ति 3. फलों द्वारा स्वास्थ्य वर्धन
4. फलों की बिक्री से निरन्तर अत्यधिक आय।
यह पद्धति भी किसानों में अधिक लोकप्रिय होती जा रही है। इसके अन्तर्गत खेतों में फलदार वृक्ष जैसे आम (कलमी) अमरूद, आँवला (कलमी), बेर, बेल, किन्नू तथा कटहल आदि को एक निश्चित दूरी पर रोपित करते हैं जो सामान्यत: 6 मी. से 10 मी. होती है। वृक्षों के मध्य में कृषि फसलों की उपज प्राप्त की जाती है। वृक्षों के बड़े हो जाने पर उनकी आवश्यकतानुसार कटाई भी करते रहते हैं जिससे फलों की अधिक उपज प्राप्त हो सके।
पश्चिमी गांगेय क्षेत्र :
कृषिरबी : गेहूँ, सरसों, चना, गन्ना, मसूर।खरीफ : मक्का, मूँग, उर्द, ज्वार।
वृक्षों की छाया होने परहल्दी, मसूर, लहसुन।
वृक्ष प्रजातिआम, आँवला, आडू।

कृषिबागवानीवनपद्धति
पूर्वी उत्तर प्रदेश, तराई व पश्चिमी गांगेय क्षेत्र में यह पद्धति अत्यन्त ही लोकप्रिय है। इसका मुख्य कारण बागवानी से होने वाला अत्यधिक लाभ तथा ग्रामीणों की वनों पर निर्भरता की कमी है। इस पद्धति के निम्न लाभ हैं :
1. सीमित क्षेत्र से अधिक लाभ की प्राप्ति।
2. ग्रामीण बच्चों की कुपोषण से बचाने हेतु पोक तत्वाें व विटामिन की कमी की पूर्ति।
3. फलों से निरन्तर आर्थिक लाभ की प्राप्ति।
4. वनों पर निर्भरता कम होना।
5. चारा पत्ती की आवश्यकता की पूर्ति।
6. जलौनी लकड़ी की आवश्यकता की पूर्ति।
इसके अन्तर्गत कृषि फसलों के साथसाथ फलदार प्रजातियां जैसे पपीता, आँवला, नींबू, अमरूद के साथ काष्ठ प्रजातियां जैसे यूकेलिप्टस, सागौन आदि को मेड़ों पर रोपित करते हैं और तीनों प्रकार के उत्पाद कृषि, फल तथा काष्ठ एक ही स्थान पर प्राप्त हो जाते हैं। यह पद्धति पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई व हरियाणा में अत्य​िाक लोकप्रिय है।
पश्चिमी गांगेय क्षेत्र :
कृषिरबी : गेहूँ, मटर, सरसों, चना, मसूर।खरीफ : मक्का, मूँग, उर्द, ज्वार, धान।
वृक्षों की छाया होने परहल्दी, मसूर, लहसुन, अदरख, टमाटर।
बागवानीआम, आँवला, अमरूद, लीची, नींबू किन्नू।
वानिकीपॉपलर, शीशम, यूकेलिप्टस।

पुष्पबागवानीकृषि एवं वन पद्धति
यह पद्धति उन्नतशील किसानों में अत्यन्त लोकप्रिय है। इस पद्धति से उगने वाले पुष्पों से किसी भी अन्य पद्धति से अधिक होती है। इसकी देखभाल में आने वाले कम खर्च व अधिक लाभ के कारण जनमानस में लोकप्रिय हो रही है। इस पद्धति के निम्न लाभ हैं :
1. निरन्तर अधिक धन की प्राप्ति।
2. शहद उत्पादन की सम्भावना।
3. कम स्थान में भी लाभकारी।
4. कम लागत व समय में अधिक लाभ।
इसके अन्तर्गत कृषक फलदार एवं काष्ठ प्रजातियों के साथ पुष्प प्रजाति जैसे लिली, ग्लैडियोलाई आदि की खेती करते हैं। इस प्रकार की पद्धति मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषकों में प्रचलित हैं। यह शहरी क्षेत्रों के निकट अधिक लाभदायक होती है।
पश्चिमी गांगेय क्षेत्र :
पुष्पगेंदा, ग्लैडियोलाई, रजनीगंधा, लिली, गुलाब
बागवानीआम, पपीता, नीबूं, कीनू
कृषिरबी : गेहूँ, चना, गन्ना, सरसाें, मसूरखरीफ : मक्का, मूँग, उर्द
वानिकीपॉपलर, यूकेलिप्टस।

वनमत्स्य पद्धति
यह पद्धति हरियाणा व पंजाब मेें अधिक लोकप्रिय है। उत्तर प्रदेश में इसके लोकप्रिय न होने का मुख्य कारण उत्तर प्रदेश में बड़े जलाशयों का अभाव है। मत्स्य विभाग, उ.प्र. ने एक हेक्टेयर क्षेत्र के माडल विकसित कर लिये हैं जिससे किसानों को प्रतिवर्ष 12 लाख रूपये प्राप्त हो सकते हैं। उत्तम मछली के बीज व बच्चे स्थानीय सहायक निदेशक (मत्स्य)से प्राप्त कर व उच्च गुणवत्ता की खाद इत्यादि डालकर अच्छी पैदावार ली जा सकती है।
इस पद्धति में तालाबों के किनारों पर बहुउद्देशीय वृक्ष लगाये जाते हैं तालाबों में उन्नत किस्म की मछलियों जैसे : रोहू, कतला, ग्रासकार्प, सिल्वर कार्प आदि प्रजातियों का उत्पादन किया जाता है। इस प्रकार की पद्धति देश के दक्षिणी प्रदेश में बहुत पहले से प्रचलित है जहाँ तालाब की मेड़ों पर नारियल के वृक्षों का रोपण करते हैं। धीरेधीरे यह पद्धति उत्तर प्रदेश के कृषकों में भी लोकप्रिय होती जा रही है। वृक्षारोपण से तालाब के किनारे की मेड़ों की मिट्टी का क्षरण नहीं हो पाता तथा इनसे पानी में गिरने वाली पत्तियां, पुष्प व फल आदि मत्स्य के भोजन में काम आता है।

गृह वाटिका पद्धति
यह पद्धति एशिया महाद्वीप में सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस पद्धति के मुख्य उद्देश्य निम्न प्रकार हैं
1. आवास के समीप दैनिक आवश्यकताआें की पूर्ति 2. मृदा संरक्षण 3. वायुप्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति 4. आवास के आसपास उत्तम वातावरण तैयार करना।
क्षेत्र के अनुसार इस पद्धति में प्रजातियाें का चुनाव किया जाता है। सामान्यत: इन प्रजातियों की देखभाल गृहणी द्वारा की जाती है। इस प्रकार यह पद्धति गृहणियाें, वृद्धों तथा परिवारों मेें अत्यन्त लोकप्रिय है।
इसके अन्तर्गत कृषक अपने आवास के समीप के खाली क्षेत्रों में अपनी आवश्यकतानुसार आम, जामुन, पपीता, बेल, सहजन, नीम, पीपल, पाकड़, गूलर, बाँस आदि का रोपण करते हैं। इस प्रकार के रोपण से कृषक अपनी दैनिक आवश्यकताआें की पूर्ति करते हैं, और उनके घरों के आसपास छाया व पशुओं के बांधने के लिये उपयुक्त स्थान


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