इतिहास और राजस्व प्रमाणों के अनुसार दिल्ली के बादशाह, शाहजहाँ,
ने सरवट (SARVAT) नाम के परगना को अपने एक सरदार सैयद मुजफ़्फ़र खान को जागीर में दिया था जहाँ पर 1633 में उसने और उसके बाद उसके बेटे मुनव्वर लश्कर खान ने
मुजफ़्फ़र नगर नाम का यह शहर बसाया।
इस जनपद का इतिहास बहुत पुराना है । काली नदी के किनारे तहसील सदर के मांडी नाम के
गाँव में हड़प्पा कालीन सभ्यता के पुख्ता अवशेष मिले हैं। अधिक जानकारी के लिये
भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने वहां पर खुदाई भी करवायी थी। सोने की अंगूठी जैसे आभूषण
और बहुमूल्य रत्नों का मिलना यह दर्शाता है कि यह स्थान प्राचीन समय में व्यापार का
केन्द्र था। महाभारत कालीन हस्तिनापुर और कुरूक्षेत्र नगरों से निकटता इस तथ्य को
बल देती है।
किंवदंती है कि कौरवों तथा पांडवों के बीच महाभारत का युद्व ग्राम पचेन्डा में
लड़ा गया । युद्व के दोरान दोनों पक्षों की सेना कुरावली तथा पंडावली ग्राम में
विश्राम करती थी ।
शुक्रताल मुजफ्फरनगर जनपद में स्थित एक विश्व प्रसिद्व
धार्मिक स्थान माना जाना जाता है ।इस स्थान पर वटवृक्ष के नीचे महर्षि शुकदेव
महाराज ने राजा परीक्षत को भागवत कथा सुनाई थी । आज भी उस स्थान पर वह प्राचीन व
पवित्र वटवृक्ष स्थित है ।
तैमूर आक्रमण के समय के फारसी इतिहास में भी इस स्थान का वर्णन मिलता है। 1399 में
गंगा के किनारे भोकड़ हेड़ी स्थान पर बड़ी संख्या में हिन्दुओं ने तैमूर की सेना का
सामना किया था परन्तु सुव्यवस्थित न होने के कारण पराजित हो गये। लम्बे समय तक मुगल
आधिपत्य में रहने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1826 में मुज़फ़्फ़र नगर को जिला
बना दिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में शामली के मोहर सिंह और थानाभवन के
सैयद-पठानों ने अंगेजों को हरा कर शामली तहसिल पर कब्जा कर लिया था परन्तु
अंग्रेजों ने क्रूरता से विद्रोह का दमन कर शामली को वापिस हासिल कर लिया। 6 अप्रैल
1919 को डा0 बाबू राम गर्ग, उगर सेन, केशव गुप्त आदि के नेतृत्व में इण्डियन नेशनल
कांगेस का कार्यालय खोला गया और पण्डित मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, मोती लाल
नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, सरोजनी नायडू, सुभाष चन्द्र बोस आदि नेताओं ने समय-समय पर
मुज़फ़्फ़र नगर का भ्रमण किया। खतौली के पण्डित सुन्दर लाल, लाला हरदयाल, शान्ति
नारायण आदि बुद्धिजीवियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 15 अगस्त
1947 को आजादी मिलने पर केशव गुप्त के निवास पर तिरंगा फ़हराने का कार्यक्रम रखा
गया।
शहर से छह किलोमीटर दूर सहारनपुर रोड़ पर काली नदी के ऊपर बना
बावन दरा पुल, करीब 1512 ईस्वी में शेरशह सूरी ने बनवाया था । शेरशाह सूरी उस समय
मुगल सम्राट हुमायूं को पराजित कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा था । उसने सेना के लश्कर
के आने जाने के लिये सड़क का निर्माण कराया था जो बाद में ग्रांट ट्रंक रोड़ के नाम
विख्यात हुई । इसी मार्ग पर बावन दर्रा पुल है । माना जाता है कि इसे इसे उस समय इस
प्रकार डिजाईन किया गया था कि यदि काली नदी में भीषण बाढ़ आ जाये तो भी पानी पुल के
किनारे पार न कर सके । पुल में कुल मिला कर 52 दर्रे बनाये गये हैं । जर्जर हो जाने
के कारण अब इसका प्रयोग नहीं किया जा रहा है । वहलना गांव में शेरशाह सूरी की सेना
के पड़ाव के लिये गढ़ी बनायी गई थी । इस गढ़ी का लखौरी ईटों का बना गेट अभी भी
मौजूद है ।
ग्राम गढ़ी मुझेड़ा में स्थित सैयद महमूद अली खां की मजार मुगलकाल की कारीगरी की
मिसाल है । 400 साल पुरानी मजार और गांव स्थित बाय के कुआं की देखरेख पुरातत्व
विभाग करता है। मुगल समा्रट औरगजेब की मौत के बाद दिल्ली की गद्दी पर जब मुगल
साम्राज्य की देखरेख करने वाला कोई शासक नहंी बचा तो जानसठ के सैयद बन्धु उस समय
नामचीन हस्ती माने जाते थे । उनकी मर्जी के बिना दिल्ली की गद्दी पर कोई शासक नहंी
बैठ सकता था । जहांदार शाह तथा मौहम्मद शाह रंगीला को सैयद बंधुओं ने ही दिल्ली का
शासक बनाया था । इन्ही सैयद बंधुओं मे से एक का नाम सैयद महमूद खां था । उन्हीं की
मजार गा्रम गढ़ीमुझेड़ासादात में स्थित हैं । जिसमें मुगल करीगरी की दिखाई पड़ती है
। 400 साल पुरानी उक्त सैयद महमूद अली खां की मजार तथा प्राचीन बाय के कुयेंं के
सम्बन्ध में किदवदन्ती है कि दोनो का निर्माण कारीगरों द्वारा एक ही रात में किया
गया था ।
जिले के शुक्रताल स्थान पर 5000 वर्ष पुराना वट वृक्ष है । जिसके नीचे बैठकर महर्षि
शुकदेव जी ने अपने श्रीमुख से राजा परीक्षित को श्रीमदभागवत की कथा सुनाई थी ।
वर्तमान में शुकदेव आश्रम में स्थित यह वटवृक्ष लाखों की आस्था का केन्द्र बना हुआ
है । देश के बड़े बड़े कथावाचक यहॉ पर आकर श्रीमदभागवत की कथा का आयोजन करने में
अपने को धन्य मानते हैं ।